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रविवार, 14 अक्तूबर, 2007 को 14:06 GMT तक के समाचार
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एक सदी के सफ़र की आपबीती

पिछले वर्ष हकीम साहब को पद्मभूषण सम्मान मिला
हकीम सैयद मोहम्मद सरफुद्दीन कादरी संभवतः सबसे उम्रदराज जीवित हकीम हैं.

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के मोहम्मद मोहसिन स्क्वायर इलाके में हकीम साहब के नाम से परिचित 106 साल के इस यूनानी चिकित्सक को इसी साल अप्रैल में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया है.

देश के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद से लेकर चक्रवर्ती राजगोपालाचारी तक का इलाज करने वाले हकीम साहब ने महात्मा गांधी के साथ दांडी की यात्रा तो की ही थी विदेशी कपड़ों के खिलाफ हुए आंदोलन के दौरान भी सक्रिय रहे थे.

नेताजी सुभाष चंद्र बोस और कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुर से भी उनकी नजदीकी रही है. देश की आजादी के लिए वे कई बार जेल भी गए. इस उम्र में भी वे रोजाना मीलों पैदल चलते हैं और लगभग सौ मरीजों का इलाज करते हैं.

हकीम साहब की कहानी उनकी ही जुबानी...

"तब और अब में काफी फर्क़ आ गया है. पढ़ाई के दौरान ही गांधी जी के नमक आंदोलन के सिलसिले में मैं उनके साथ हो गया. उसी दौरान हमने विदेशी कपड़े जला कर खादी और सूती को अपनाया था.

बाद में सुभाष चंद्र बोस और रवींद्रनाथ ठाकुर से कोलकाता में कई मुलाकातें हुईं. क्या गजब का संकल्प था सुभाष बाबू में. तब के नेता देश और आम लोगों के लिए लड़ते थे. अब तो लोग अपने लिए लड़ते हैं.

गया में यूनानी चिकित्सा की पढ़ाई के बाद स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय रहा. 1936 में कोलकाता आया. तबसे यहीं का होकर रह गया. मैंने गया में राजेंद्र बाबू का इलाज किया था. उनको सांस (दमे) की बीमारी थी.

रोज़ सौ से ज्यादा मरीज़ों का इलाज

गया में रहते हुए आज़ादी की लड़ाई के सिलसिले में कई बार जेल गया. बाद में फुलवारी शरीफ के काज़ी अवन अहमद कादरी के साथ कटक में भी गिरफ्तार हुआ. गांधी के साथ दांडी मार्च पर भी गया. उस समय की खास बात यह थी कि ब्रितानी पुलिस बूढ़ों, बच्चों और महिलाओं को हाथ नहीं लगाती थी.

आज़ादी के बाद अपनी पुलिस ने इनमें कोई भेदभाव नहीं रखा है. तस्वीर पूरी बदल गई है. मैं चुपचाप देखता रहता हूँ. आजादी की लड़ाई में सक्रिय रहने के बावजूद मुझे सरकार ने स्वाधीनता सेनानी नहीं माना. न तो पेंशन मिलती है और न ही कोई अन्य सुविधा.

सक्रिय

मैंने यहाँ भी यूनानी मेडिकल कॉलेज की स्थापना की है लेकिन इसमें सरकार से कोई सहायता नहीं मिली. इसके लिए आम लोगों से चंदा वसूला गया था.

रोज सौ मरीजों को देखता हूँ. लगभग मुफ्त. बाहर से इलाज के लिए जो लोग आते हैं वे जबरन कुछ पैसे दे जाते हैं. उनसे ही खर्च चलता है. एक बेटा एमबीबीएस कर दुबई चला गया. दूसरा साथ ही रहता है. दस गुना दस फीट की इस कोठरी में ही मरीजों को देखता हूँ.

हकीम साहब का छोटा सा दवाखाना दशकों से चल रहा है

एक बार अमरीका गया तो वहां अधिकारियों ने मुझे ग्रीन कार्ड देकर वहीं बसने का प्रस्ताव दिया था लेकिन मैंने कहा कि मुझे अपना हिंदुस्तान ही प्यारा है. वहाँ मेरे मरीजों का क्या होगा ?

अब सरकार ने इस साल पद्मभूषण की उपाधि देकर दो तमगे दे दिए हैं. वह भी सोने के नहीं हैं लेकिन इससे क्या होगा, जीवन से कुछ मांगा नहीं. आज मेरे पास अपना कहने को एक अदद घर भी नहीं है. जब आजादी की लड़ाई में कूदा था तब घर की चिंता नहीं की थी. अब उसी घर की चिंता सताए जा रही है. लेकिन आज घर ही नहीं है.

आज कल जो लड़के टीवी में गाते हैं उनको करोड़ों मिलते हैं, लेकिन मेरे पास कुछ भी नहीं. अब मेरे पास अतीत ही सबसे बड़ी पूंजी है. वर्ष 1959 में मैंने कोलकाता से ही ‘हिकमते बांग्ला’ नामक एक पत्रिका भी निकाली थी जो बाद में आर्थिक तंगी के चलते बंद हो गई.

इराक़, मिस्र, जॉर्डन, फलीस्तीन और अमरीका समेत कई देशों में गया हूँ. श्री रविशंकर भी अक्सर दक्षिण भारत से मरीजों को इलाज के लिए मेरे पास भेजते रहते हैं.

बहुत लंबी कहानी है. इन आंखों ने क्या-क्या नहीं देखा? धीरे-धीरे मेरे समकालीन लोग बिछड़ते चले गए. न जाने यह शरीर किस मिट्टी का बना है? इस उम्र में भी मीलों पैदल चलता हूँ और महीने में 15 दिन उपवास रखता हूँ.

जब तक सांस है मरीजों की सेवा करता रहूंगा लेकिन स्वाधीनता सेनानी का दर्जा नहीं मिलने का दर्द आजीवन सालता रहेगा."

(कोलकाता में पी.एम.तिवारी से बातचीत पर आधारित)

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