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रिटायर होने के 13 साल बाद बारहवीं की परीक्षा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कहते हैं कि मन में लगन हो तो कोई भी काम असंभव नहीं है. पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से सटे डायमंड हार्बर के रामचंद्र वैद्य ने इस बात को सच साबित कर दिखाया है. वे 73 साल की उम्र में पश्चिम बंगाल बोर्ड की 12वीं की परीक्षा दे रहे हैं. डायमंड हार्बर के पास के एक गाँव के रामचंद्र मंगलवार से शुरू इस परीक्षा में सबसे ज्यादा उम्र के परीक्षार्थी हैं. उन्होंने वर्ष 1955 में 10वीं की परीक्षा पास की थी लेकिन उसके बाद चार बेटों और दो बेटियों को पढ़ाने-लिखाने, उनके शादी-ब्याह और फिर पंचायत समिति के सचिव का कामकाज करते हुए उनको आगे पढ़ने का मौका ही नहीं मिला. रामचंद्र कहते हैं कि "अब जीवन में जिम्मेदारियों से फुर्सत मिली है. मैं एमए पास करना चाहता हूँ. शिक्षा की कोई उम्र नहीं होती. मैं इसके बाद बीए करूँगा और फिर एमए". वे 13 साल पहले सरकारी नौकरी से रिटायर हुए थे. जब उनसे पूछा गया कि इससे पहले आपको पढ़ने का ख्याल क्यों नहीं आया, इसके जवाब में वे कहते हैं कि "बेटे-बेटियों की पढ़ाई और शादी-ब्याह के चक्कर में उलझा रहा. अब वे अपने पैरों पर खड़े हो गए हैं इसलिए मैंने दोबारा पढ़ाई शुरू करने का फैसला किया." उनकी पत्नी दयामयी बताती हैं कि "पढ़ाई में उनकी शुरू से ही दिलचस्पी रही. लेकिन विभिन्न कारणों से वे आगे नहीं पढ़ सके. अब तीन महीने पहले उन्होंने निजी परीक्षार्थी के तौर पर फार्म भर दिया और किताबें खरीद लाए. मेरे पति इन तीन महीनों में रात-रात भर पढ़ते रहे." रामचंद्र की इस लगन ने उनके बेटे नारायण में भी एक नया जोश पैदा कर दिया है. अपने पिता को परीक्षा केंद्र तक पहुँचाने आया नारायण कहता है कि "पिताजी की लगन देखकर मेरे मन में भी एक नया उत्साह पैदा हो गया है." उसने वर्ष 1988 में 12वीं तक पढ़ाई करने के बाद आगे कुछ नहीं किया था. अब वह भी बीए की परीक्षा देना चाहता है. उसका कहना है कि "जब पिताजी इस उम्र में परीक्षा दे रहे हैं तो वह क्यों नहीं दे सकता." 73 साल के परीक्षार्थी रामचंद्र को देखकर परीक्षा केंद्र सरिसा हाई स्कूल के शिक्षक और दूसरे परीक्षार्थी भी हैरान हैं. रामचंद्र के साथ उनके पोटे-पोतियों की उम्र के परीक्षार्थी 12वीं की परीक्षा दे रहे हैं. स्कूल के प्रिंसिपल तुषार कांति दास कहते हैं कि "उन्होंने अब तक इतनी उम्र का कोई छात्र नहीं देखा है. रामचंद्र ने साबित कर दिया है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती." |
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