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कौन याद करता है चले जाने के बाद…. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ज़िंदगी क़दम-क़दम पर पता नहीं कितने रंग बदलती है- ये बातें किताबों में पढ़ी थीं, लोगों से सुनी थी..पिछले 35 सालों में मैने ज़िंदगी के ऐसे-ऐसे रंग देखे हैं कि अब लगने लगा है कि देखने समझने को शायद कुछ बचा नहीं है. बात वर्ष 1973 की है. मैं पाकिस्तान की सीमा में चला गया और मुझे वहाँ की फौज ने गिरफ़्तार कर लिया था. मेरी ज़िंदगी के करीब 35 साल बतौर भारतीय क़ैदी पाकिस्तान की जेल में बीत गए. जीवन का एक-एक पल अनमोल होता है, समझ में नहीं आता कि उन तमाम सालों के अनगिनत पलों का हिसाब-किताब कैसे करूँ. जेल में बिताए पलों को शब्दों में उतारकर पेश करना मुश्किल काम है. पैतींस वर्षों की सज़ा में से काल कोठरी में बिताए तन्हा 20-25 साल, लोहे की बेड़ियों में 18 साल तक बंधे पैर और पैरों पर पड़े कभी न मिटने वाले निशां, मन में अपने नन्हें बच्चों का तसव्वुर जिन्हें मैं पीछे छोड़ आया था, घर वापस लौटने की टीस...इन एहसासों को क्या और कैसे शब्दों में बया करूँ? जेल में उदासी और तन्हाई के इन्हीं पलों में मैने सुकून की तलाश की किताबों में, क़ुरान-ए-पाक़ भी पढ़ा. मुझ पर नज़र रखने का जिम्मा जेल के जिन मुलाज़िमों पर था, उनमें से कइयों से याराना भी हो गया. उन्हें के साथ बैठकर भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच भी देखे. कभी उम्मीद और कभी नाउम्मीदी-विरोधाभासी भावनाओं के बीच झूलता रहा मैं. कभी तो अपनों की बेहद याद सताती और कभी मैं अपने आप को इतना कड़ा और कठोर कर लेता जैसे शायद कोई नहीं है. (पाकिस्तानी जेल में 35 साल तक क़ैद रहे भारत के नागरिक कश्मीर सिंह के अनुभव आप बीबीसी हिंदी डॉट कॉम पर हर बुधवार को पढ़ सकते हैं. ये लेख बीबीसी संवाददाता वंदना से बातचीत पर आधारित है. आप अपनी राय हमें [email protected] पर भी भेज सकते हैं.) रूठ न जाना तुमसे कहूँ तो...
ख़ैर आज जब मैं भारत में अपने गाँव वापस लौटा हूँ तो ग़नीमत है कि बसा बसाया परिवार है- मेरे पास पत्नी है, बेटे हैं, बेटी है, पत्नी है, बहू है, पोते-पोतियाँ हैं. वापस आने के बाद मेरा घर गुलज़ार है तो ये क़ुर्बानी मेरी पत्नी की है. उसने इतनी क़ुर्बानियाँ दी हैं कि मेरे पास कोई शब्द नहीं है. मैने तो अपनी पूरी जवानी जेल में निकाल दी पर मेरे बच्चों को पाल-पोस कर मेरी बीवी ने ही बड़ा किया, उसी ने मेरा घर बसाया है. मैं पूरी ज़िंदगी के लिए उसका एहसानमंद हो गया हूँ. आजकल कभी-कभी मैं उससे कुछ कहने से भी डरता हूँ..35 साल बाद मिली है न, डर लगता है कहीं नाराज़ न हो जाए. इन 35 सालों में मेरी ज़िंदगी मानो तबाह हो गई लेकिन मिला कुछ नहीं. परिवार की आर्थिक हालत किसी से छिपी नहीं है. मेरे बच्चों ने बेहाल ज़िंदगी बिताई है. अफ़सोस बस इस बात का है कि जब मैं अपने घर से दूर था तो पीछे से किसी ने परिवार की बात तक नहीं पूछी. कहते हैं न... कौन किसी को याद करता है चले जाने के बाद जब मुश्किल के बेला थी कि किसी ने मुँह नहीं किया. अब जब मैं वापस आ गया हूँ तो सुबह-शाम घर पर लोगों का मेला सा लगा रहता है. बड़ा अजीब लगता है जब लोग न जाने कहाँ-कहाँ से मिलने आते हैं और कहते हैं कि हम तो आपको बड़ा याद किया करते थे. सरकार ने भी अभी तक सिर्फ़ वादे ही किए हैं मदद के, हाथ में कुछ नहीं आया है. ख़ैर, ये सफ़र का वो मकाम है जहाँ मैं आज खड़ा हूँ, ये वो वर्तमान है जिसे आप लोग देख-पढ़-सुन पा रहे हैं. लेकिन मैं आपको अपने साथ अतीत के सफ़र पर ले जाना चाहता हूँ- पाकिस्तान की जेल कोठरी में बंद रहे एक भारतीय क़ैदी का 35 साल का सफ़र. अगले अंक से मैं आपको इसी सफ़र पर ले चलूँगा. ( 35 साल पाकिस्तान की जेल में बिताने के बाद कश्मीर सिंह चार मार्च को अपने वतन लौटे हैं. कश्मीर सिंह के जीवन के अनुभवों पर आधारित यह श्रृंखला बीबीसी संवाददाता वंदना से उनकी बातचीत पर आधारित है. इसके आगे की कड़ी आप अगले बुधवार को पढ़ पाएँगे.) |
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