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मौत के कितने पास आ गए... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अट्ठाइस मार्च 1978, बात तीस साल पुरानी है. पर वो दिन आज भी ज़हन में ताज़ा है. आप में से कई लोगों को भी अपने जीवन से जुड़ी तीस साल पुरानी बातें याद होंगी- बचपन की अठखेलियाँ, लड़कपन की शैतानियाँ, जवानी के दिनों में यहाँ-वहाँ मस्ती, कुछ ख़ास दोस्तों के साथ दिल्लगी, रूठना मनाना, नौकरी की तलाश, पहली पगार, कभी ख़ुशी तो कभी उदासी के पल. मेरी यादें आपकी यादों से कुछ अलग हैं. ये यादें मौत के गलियारों से होकर गुज़रती हैं. 1978 में पाकिस्तानी जेल में कई क़ैदी थे और उनमें से कई की अपील पाकिस्तान के राष्ट्रपति के पास गई हुई थी. उनमें से मैं –भारतीय क़ैदी कश्मीर सिंह भी एक था. अपील ख़ारिज हो गई. 23 मार्च को 1978 को अपील ख़ारिज हुई और 28 मार्च को मुझे फाँसी लगाए जाने का फ़ैसला भी आ गया. फाँसी लगना तय था, मौत और ज़िंदगी के बीच बस दो घंटे का फासला बचा था.. आख़िरी रात थी मेरी. उस काली स्याह रात का पूरा मंज़र, एक-एक पल ज्यों का त्यों आज भी याद है. फाँसी से पहले मिट्टी के मुकाबले बंदे का तोल किया जाता है. वहाँ जेल में एक बोरी में मेरे वज़न बराबर मिट्टी डालकर ये टेस्ट किया गया कि फाँसी में इस्तेमाल होने वाली रस्सी मेरा भार सह सकती है या नहीं, कहीं टूट तो नहीं जाएगी. रात भर पुलिस गश्त लगाती रही, हर आधे घंटे बाद मुलाज़िम मुझे आकर चेक कर रहे थे. चार बजे मुझे फाँसी लगाई जानी थी. फाँसी में करीब दो घंटे का समय बचा था कि अचानक मुझे रात के दो बजे पता चला कि फाँसी की सज़ा पर फ़िलहाल रोक लगा दी गई है. मौत के इतने करीब जाकर मैं लौट आया. उस दिन तो जान बख़्श दी गई लेकिन 1978 से लेकर 2008-तीस साल लग गए अपने देश लौटने में मुझे. मौत की गिरफ़्त से बच गया पर ‘ज़िंदगी’ की चंगुल में कै़द हो गया. ख़ैर फ़िलवक़्त जेल ही मेरी दुनिया थी. जेल में मैं अपने आप तक ही सीमित रहता. मैं कोशिश करता था कि किसी को मौक़ा न मिले कि वो मुझसे बुरा बर्ताव करे. यूँ ही वक़्त कटने लगा. बेड़ियों में जकड़ा इंसान और करे भी क्या. करीब 18 सालों तक पैरों में बेड़ियाँ डाल कर रखी गईं- साढ़े सात किलो वज़नी बेड़ियाँ. (पाकिस्तानी जेल में 35 साल तक क़ैद रहे भारत के नागरिक कश्मीर सिंह की अगली डायरी आप बीबीसी हिंदी डॉट कॉम पर बुधवार से पढ़ सकते हैं. इस लेख पर अपनी राय हमें hindi.letters@bbc.co.uk पर भी भेज सकते हैं.) दाना-पानी की कहानी
जिस जेल में मैने उम्र का इतना बड़ा हिस्सा गुज़ार दिया ज़ाहिर है वहाँ के खान-पान का असर भी पड़ता है. आप सोच रहे होंगे कि काल-कोठरी की बातों से मैं अचनाक खाने-पीने की बातें क्यों करना लगा. भई इंसान है तो भूख भी लगेगी, ज़िंदा रहने की उम्मीद को बचाए रखना है तो खाना भी पड़ेगा. जेल में सबको एक सा खाना मिलता था. कई जानवरों के गोश्त मिलते थे, हफ़्ते में दो दिन चिकन देते थे, बुधवार और शनिवार को अंडे भी मिलते थे. दाल और सब्ज़ी भी होती थी. ‘दाल-सब्ज़ी और दो अंडे खाने को मिलते थे’-ये सब आपको शायद छोटी और ग़ैर मामूली बातें लग सकती हैं. पर एक क़ैदी की दुनिया इन छोटी-छोटी बातों में ही सीमित होती है. छप्पन भोग के बारे में सोचकर करता भी क्या उस समय. जेल में वैसे कोई मजबूरी नहीं थी कुछ खाने या न खाने पर. जिसका मन है खाए वरना न खाए. सच बात तो ये है कि मैं खाने में मीन-मेख कम ही निकालता था. और आप कर भी क्या सकते हैं-न भी खाना चाहें तो भी खाना पड़ेगा ही. जब आप क़ैदी ही बन गए हों तो बाक़ी चीज़ें बेमानी हो जाती हैं. अमूमन जितने भी क़ैदी थे, वो जो मिले खा लेते थे. कम से कम मुझे तो लगता है कि जब मैने खा लिया तो बाक़ी लोगों ने भी खा ही लिया होगा. मेरी ज़िंदगी बस इन्हीं दायरों में सीमित थी. पर ज़ाहिर है इन 30 सालों में दुनिया में कई तरह के बदलाव आए- घर-घर टेलीवीज़न आया जहाँ पल-पल की ख़बर मिलती रहती है, ऐसा मोबाइल फ़ोन जिसे हथेली पर उठाकर कहीं भी घूम सकते हैं और न जाने क्या-क्या. लोग पूछते हैं कि जेल में रहते हुए क्या मुझे अंदाज़ा था कि आख़िर बाहरी दुनिया किस हद तक बदल गई है. इन तीन दशकों में तो मैं ख़ुद ही पूरी तरह बदल गया. मुझे जब अपना होश ही नहीं रहा तो बाक़ी दुनिया के बारे में क्या जानूँ. ये तो मुझे जेल से बाहर आकर ही पता चलना था कि दुनिया का रंग-ढंग और चाल कितनी बदल गई है. ( अगली बार बात होगी धर्म के मुद्दे और हाँ मेरे पसंदीदा खेल क्रिकेट की भी) ( 35 साल पाकिस्तान की जेल में बिताने के बाद कश्मीर सिंह चार मार्च 2008 को अपने वतन लौटे हैं. कश्मीर सिंह के जीवन के अनुभवों पर आधारित यह श्रृंखला बीबीसी संवाददाता वंदना से उनकी बातचीत पर आधारित है. इसके आगे की कड़ी आप बुधवार से पढ़ पाएँगे.) |
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