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नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा.... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इस निजी डायरी के ज़रिए मैं आपको अपने अतीत के उस सफ़र का हमराही बनाना चाहता हूँ जो सफ़र पाकिस्तान की जेल में बीता. आगे बढ़ने से पहले मैं 20-25 वर्ष के 'जवान' कश्मीर सिंह के बारे में थोड़ा बताना चाहूँगा-वो कश्मीर सिंह जिसकी यादें केवल एक फ़ोटोफ़्रेम में जड़ी तस्वीर में क़ैद होकर रह गई हैं. घर की मेज़ पर रखी इस तस्वीर में जड़ा जवान कश्मीर सिंह मानो टकटकी लगाए बुढ़ाए, झुर्रियों वाले नए कश्मीर सिंह को पहचानने की कोशिश कर रहा हो. ग़नीमत है कि घर वालों ने इस तस्वीर को संभाल कर रखा हुआ है. पंजाब के होशियारपुर ज़िले का एक छोटा सा गाँव था नंगलचोरां, वहीं 1941 में मेरा जन्म हुआ. ‘गाँव था’- ये इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि मेरे पीछे से इस गाँव का नाम नंगलचोरां से नंगलखिलाड़ियाँ हो गया है. अजीब विसंगति है -35 सालों में मेरा नाम बदल गया, बाहरी दुनिया भी बदली, कई लोगों को तो मेरा चेहरा-मोहरा पहचानने में भी दिक्कत होती है. इन तमाम बदलावों के बीच जेल से रिहा होने के बाद सोचा था कि अपने गाँव जाऊँगा, वापस आकर पता चला कि मेरे गाँव का नाम भी बदल गया है. हर चीज़, हर बात में बदलाव जैसे ये एहसास दिला रहें हो कि...ख़ैर छोड़िए आप इसे नंगलखिलाड़ियाँ कहें या नंगलचोरां, गाँव की मिट्टी तो वही है. बचपन-जवानी मेरी यहीं बीती. पढ़ाई-लिखाई तो मैने ज़्यादा की नहीं. और सच बात तो ये है कि जो कक्षाएँ पास की भी, नकल मार कर ही पास की हैं. (पाकिस्तानी जेल में 35 साल तक क़ैद रहे भारत के नागरिक कश्मीर सिंह की अगली डायरी आप बीबीसी हिंदी डॉट कॉम पर इस शनिवार को पढ़ सकते हैं. इस लेख पर अपनी राय हमें [email protected] पर भी भेज सकते हैं.) ज़िंदगी का सफ़र..
किसी भी अन्य गबरू-जवान की तरह मेरा भी ब्याह हुआ. ये 1964 की बात होगी. मेरी शादी परमजीत कौर से हुई. अच्छा ख़ासा परिवार था मेरा. तीन बच्चे थे- दो बेटे और एक बेटी. मैं सन 1967 में पुलिस में भर्ती हुआ लेकिन पुलिस की नौकरी मैने ज़्यादा देर नहीं की और जल्द ही छोड़ दी-1967 से लेकर 1971 तक. नौकरी छोड़ने के कई कारण रहे. समझिए कि इंसान से नौकरी में कई ग़लतियाँ हो जाती हैं और फिर कुछ पारिवारिक समस्या भी थी. नौकरी छोड़ने के बाद मैं साल-छह महीने घर पर ही रहा. उसके बाद 1973 में पाकिस्तान गया.यहीँ से शुरू हुआ वो सफ़र जिसने ज़िंदगी का रुख़ बदल डाला. लोगों के ज़हन में सबसे बड़ा सवाल शायद यही है कि मैं क्यों और कैसे पाकिस्तान गया. यहाँ मैं इससे ज़्यादा कुछ नहीं कहूँगा कि बस ‘पिकनिक’ मना रहा था और पाकिस्तानी सीमा में चला गया. या कहूँ कि पेट की ख़ातिर गया था और फँस गया जाकर. उसके बाद तो जैसे ज़िंदगी ही बदल गई. पाकिस्तानी सीमा में मुझे वहाँ की फ़ौज ने पकड़ लिया. शुरू में मैने अपना नाम बताया मोहम्मद रफ़ीक़ और पिता का नाम ग़ुलाम मोहम्मद. और ये नाम सोचे समझे थे. पकड़े जाने के बाद ज़ाहिर है पूछताछ शुरू हो गई. पूछताछ का सिलसिला चलता रहा लेकिन मेरी ज़ुबान पर भी ताला लगा रहा. ग़ैर मु्ल्क़ का क़ैदी
सबके मन में सवाल आता है कि मुझे पाकिस्तान की जेल में कैसे रखा गया होगा- परेशान किया होगा या मारा पीटा होगा. ये बड़ी स्वाभाविक सी बात है कि जब कोई इंसान पहले-पहले पुलिस के हत्थे चढ़ता है तो अच्छा सुलूक तो नहीं होता. यहाँ भारत में भी अगर पुलिस किसी आते-जाते को ही पकड़ ले, तो आमतौर पर उससे अच्छा बर्ताव नहीं करती, फिर मैं तो ग़ैर मुल्क का क़ैदी था. जेल में अकेले रखा गया- एकदम अकेले,किसी से मिलने की इजाज़त नहीं थी. समझिए कि बस आख़िरी को दो-चार महीनों में मैं लोगों के साथ घुला-मिला. पाकिस्तान आने से पहले मैं भारत में एक हँसता-खेलता परिवार छोड़कर आया था. बड़ा बेटा आठ साल का था, छोटा बेटा चार साल का और मेरी बच्ची तो बस डेढ़ साल की थी. जेल पहुँचने के बाद शुरू में मुझे रत्ती भर भी जानकरी नहीं थी कि परिवार वाले कैसे हैं और न ही उन्हें मेरे बारे में कुछ पता था. इस बीच मुझे नहीं लगा कि भारत सरकार ने मुझे छुड़ाने की कोई कोशिश की होगी या बातचीत की होगी. 1973 में पकड़े जाने के बाद सज़ा के लिए ज़्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा मुझे. जल्द ही सज़ा-ए-मौत सुना दी गई. 28 मार्च 1978 को फाँसी लगना तय हुआ. फाँसी लगने में दो घंटे का समय बचा था. लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था...किस्मत के इस खेल के आगे की कहानी अगली बार जारी रहेगी. ( 35 साल पाकिस्तान की जेल में बिताने के बाद कश्मीर सिंह चार मार्च 2008 को अपने वतन लौटे हैं. कश्मीर सिंह के जीवन के अनुभवों पर आधारित यह श्रृंखला बीबीसी संवाददाता वंदना से उनकी बातचीत पर आधारित है. इसके आगे की कड़ी आप शनिवार को पढ़ पाएँगे.) |
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