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प्राकृतिक आपदाओं से नहीं निपट पातीं सरकारें | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
ब्रिटेन की सहायता एजेंसी ऑक्सफ़ैम का कहना है कि दक्षिण एशिया में प्राकृतिक आपदाओं के मानवीय त्रासदी में बदलने के लिए सरकारी तंत्र का विफल हो जाना मुख्य कारण है. संस्था ने अपनी रिर्पोट में कहा है कि मानवीय त्रासदी के लिए प्रकृति से अधिक राजनैतिक निष्क्रियता, ग़लत निर्णय और ख़राब प्रबंधन ज़िम्मेदार हैं. दक्षिण एशिया बाढ़, चक्रवात, सूखा और भूकंप के लिए अतिसंवेदनशील क्षेत्रों में से एक है. ख़राब प्रबंधन ऑक्सफ़ैम की रिर्पोट में कहा गया है कि कश्मीर में 2005 में आए भूकंप में, जापान में 1995 में आए भूकंप की तुलना में 12 गुना अधिक लोग मारे गए थे. संस्था का कहना है कि इस क्षेत्र में थोड़ी प्रगति तो हुई है, लेकिन अभी बहुत कुछ करने की ज़रूरत है क्योंकि जलवायु परिवर्तन के कारण यह क्षेत्र अधिक संवेदनशील होता जा रहा है. ब्रिटेन सरकार ऑक्सफ़ैम की इस दलील से सहमत है कि प्राकृतिक आपदा के बेहतर प्रबंधन से लोगों की जान बचाई जा सकती है. ब्रिटेन के अंतरराष्ट्रीय विकास मंत्रालय ने कहा है कि ब्रिटेन सरकार पाकिस्तान में मज़बूत पुल और घर बनाने के लिए सहायता दे रही है और वह दक्षिण एशिया में सुनामी की पूर्व चेतावनी देने वाले केंद्र के निर्माण में आर्थिक मदद भी दे रही है. दक्षिण एशिया ने देखा है कि प्राकृतिक आपदा के परिणाम भयावह हो सकते हैं. पिछले साल बांग्लादेश, नेपाल और भारत में आई बाढ़ से 30 लाख लोग प्रभावित हुए थे. कश्मीर और जापान ऑक्सफ़ैम की रिर्पोट के अनुसार कश्मीर में 2005 में आए भूकंप में 75 हज़ार लोग मारे गए थे, जबकि 1995 में जापान में आए भूकंप में इससे बहुत कम लोग मारे गए थे, क्योंकि वहाँ प्राकतिक आपदा से निपटने की तैयारी बढ़िया थी. रिपोर्ट के अनुसार इस तरह की कुछ प्राकृतिक आपदाएँ दक्षिण एशिया को आर्थिक रूप से भी पीछे धकेल देती हैं. प्राकृतिक आपदाओं से हर साल इस क्षेत्र के कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का छह फ़सदी तक नुक़सान हो जाता है. ऑक्सफ़ैम ने बांग्लादेश की तात्कालिक चेतावनी प्रणाली और चक्रवात से बचाव का उपाय करने के लिए सराहना की है, जिससे वहां पिछले साल नवंबर में आए चक्रवात में हज़ारों लोगों की जान बच गई थी. ऑक्सफ़ैम के दक्षिण एशिया के निदेशक अश्विनी दयाल का कहना है कि सही नीतियों और बेहतर प्रबंधन से धन और जन क्षति से बचा जा सकता है. वह कहते हैं कि इस करह की तैयारियों पर आने वाला ख़र्च प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुक़सान से कम होता है. दयाल कहते हैं, "समस्या यह है कि सरकारें और दानदाता रोकथाम के तरीकों को प्राथमिकता नहीं देते." ऑक्सफ़ैम के अनुसार इस क्षेत्र में अभी बहुत कुछ किया जाना है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन इस क्षेत्र को और अधिक असुरक्षित बनाता जा रहा है. |
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