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मुंबई के बैंक ने दी यौनकर्मियों को आशा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सीता पिछले 30 साल से मुंबई के बदनाम इलाके कमाठीपुरा में रहते हुए अपना ही नहीं अपनी बच्ची का भविष्य भी बर्बाद कर रही है. लेकिन वह कहती है, "अगर मैं अपनी नातिन के लिए कुछ कर सकूँ तो यह भी काफ़ी होगा." यह ‘कुछ’ संभव हो सकता है संगिनी महिला कोआपरेटिव बैंक की मदद से. चालीस की उम्र पार कर चुकी सीता का कहना है कि अब उसकी आय लगभग ख़त्म हो चुकी है. वह कहती है कि अब वह उतना नहीं कमा सकती जितना तब कमाती थी जब वह युवा थी. उसके अनुसार, "लेकिन इससे पहले पैसा बचाने के लिए मेरे पास कोई उपाय नहीं था. अगर पैसा सुरक्षित रखने के लिए किसी दुकानदार या वेश्यालय के मालिक को देते थे तो वह कभी वापस नहीं मिलता था." मुंबई के लगभग छह हज़ार यौनकर्मियों में से एक सीता कहती है कि वह एक दिन में करीब सौ रुपये कमाती है और आवश्यक रूप से इसका एक तिहाई हिस्सा बैंक में जमा करती है. कमाठीपुरा के बाज़ार में वेश्यालयों, रेस्टोरेंटों और दुकानों के बीच स्थित छोटा सा संगिनी बैंक 1700 से भी अधिक खातों का संचालन कर रहा है.
पिछले महीने से इसने 15 हज़ार रुपयों तक का ऋण देना भी शुरू किया है. अपने संग्रह कार्यकर्ताओं की मदद से घर-घर जाकर कैश का संग्रह करने वाला यह बैंक कमाठीपुरा के यौनकर्मियों में बहुत लोकप्रिय हो रहा है. बिना किसी शर्त के पैसे जमा करने वाले इस बैंक में कोई सिर्फ़ दस रुपए भी जमा करवा सकता है. इस बैंक के ज़्यादातर कर्मचारी भी इसी समुदाय से संबंधित हैं. संगिनी यौनकर्मियों को वित्तीय सहायता देने वाला भारत का दूसरा संगठन है. पहले नंबर पर कोलकाता में यौनकर्मियों को सहायता करने वाले और 1994 से चल रही ‘उषा मल्टीपर्पज़ कोआपरेटिव सोसायटी’ का नाम है. उधारी की आदत अमरीका स्थित पॉपुलेशन सर्विसेज़ इंटरनेशनल की राज्य निदेशक डॉ शिल्पा मर्चेंट कहती हैं, "संगिनी का विचार कई सालों की मेहनत का नतीजा है." उनके अनुसार, "जब हम क्षेत्र में एचआईवी के बचाव पर काम कर रहे थे तब महसूस किया कि इन महिलाओं के पास बचत के सिवाय कोई रास्ता नहीं है." उन्होंने बताया कि उनके पास कोई कागज़ात नहीं थे लेकिन बड़ा कर्ज़ था. वे स्थानीय व्यक्ति से कर्ज़ लेती थीं जो उनसे बहुत ज़्यादा ब्याज वसूल करता था. वेश्यालय का मालिक लड़कियों को बताता है कि उन्हें अपना शरीर बेचना होगा ताकि उनके परिवार को दिया गया कर्ज़ चुकाया जा सके.
यह कर्ज़ चार या पाँच सालों में चुका दिया जाना चाहिए. लेकिन तब तक महिलाओं के पास वेश्यावृत्ति करने के सिवाय कोई उपाय नहीं होता. और कभी न चुक पाने वाले कर्ज़ के साथ उनका शोषण चलता रहता है. यह कर्ज़ अनेक कारणों के लिए लिया जाता है. कभी इलाज के लिए तो कभी परिवार की सहायता के लिए. कभी बच्चों की पढ़ाई के लिए तो कभी अपने घर जाने के लिए. अपने पेशे की श्रंखला में सबसे नीचे होने वाली यौनकर्मियों के पास अपने स्वास्थ्य की परवाह करने के मौके कम ही होते हैं. गहरा विश्वास जब डॉ मर्चेंट एचआईवी के बचाव के लिए इन महिलाओं से मिलीं तो उन्हें लगा कि जब तक उनके पास पैसा नहीं होगा, कुछ भी बदलने वाला नहीं है. वे कहती हैं, "यौनकर्मी अब कंडोम का इस्तेमाल न करना चाहने वाले ग्राहक को तभी इंकार कर सकती हैं जब उनके पास कुछ अतिरिक्त पैसा हो." वे कहती हैं, "हमारा प्रयास है कि उन्हें कम असहाय और असुरक्षित बनाएं. कोई और उपाय न होने पर इस तरह के बैंक का विचार उभरा." चूँकि बहुत से यौनकर्मी ख़ुद ही पैसे का संग्रह करने का काम करते हैं, उसके खाते का हिसाब रखना, पैसा जमा करना और फ़ोटो पहचान पत्र देना बहुत आसान हो गया. सभी यौनकर्मियों को सदस्यता के लिए कुछ पैसे के साथ खाता खोलना आवश्यक है. उनकी फ़ोटो बैंक में रखी जाती है और पासबुक उन्हें उनके कमरे पर दे दी जाती है.
यह बैंक वित्तीय रूप से कैसे काम करे, इस पर जीवन साहा और प्रेम प्रकाश साहा ने काम किया. इस बैंक की ब्याज दरें सरकारी बैंकों के बराबर ही रहती हैं. एक सेवानिवृत्त मैनेजर की मदद से बैंक के कामकाज को देखने वाले प्रेमप्रकाश साहा कहते हैं, "कभी कभी यह लोग पैसे के प्रति इतने उपेक्षापूर्ण होते हैं कि बस आते हैं और बहुत से पैसे देकर चले जाते हैं." उनके अनुसार, "वे ब्याज दर नहीं समझते और न ही बचत. वे सिर्फ़ विश्वास के सहारे चलते हैं जिसकी दर बहुत ऊँची है." उनके अनुसार हमारे पास अक्काताई जैसे कुछ लोग हैं जो यह जानते हैं कि उपेक्षापूर्ण व्यवहार करने वालों से क्या कहा जाए. इसी पेशे से संबंध रखने वाली अक्काताई ख़ास क्षेत्र में क़रीब सौ खातों का हिसाब देखती हैं. एक चौकस संग्रहकर्ता होने के अलावा वह एक दोस्त और मार्गदर्शक की भूमिका भी निभाती हैं. वे कहती हैं, "मैं उनमें ज़्यादातर से बड़ी हूँ. मैं उन्हें बचत करने और अपनी ज़िंदगी की चिंता करने के लिए सहमत करती हूँ. कई बार तो मुझे उन्हें डाँटना भी पड़ता है कि अगर वे कुछ बचत करेंगी तो कम से कम उनके बच्चों को एक बेहतर ज़िंदगी मिल सकती है." 21 वर्षीय समीरा अपने तीन साल के बेटे के लिए बचत करना चाहती है जो उसके माता-पिता के पास रहता है. वह बताती है, "मेरी शादी बहुत जल्दी हो गई थी. मेरा पति मर गया तो मुझे यहाँ आना पड़ा." वह कहती है, "मैं कोशिश कर रही हूँ कि यहाँ से किसी तरह निकल सकूँ. अगर मैं यह पेशा छोड़ न सकूँ तब भी. मैं बस किसी और जगह रहना चाहती हूँ." उसका सवाल है, "अगर मैं किसी को परेशान नहीं करूँ तो कोई मुझे रिहायशी इलाके में क्यों नहीं रहने देगा." बहुत सी यौनकर्मी सीता जैसी हैं जो अपने भाग्य को तकदीर मान चुकी हैं और कुछ समीरा जैसी भी हैं जो अब भी समाज में स्वीकार्य होने की कोशिश कर रही है. संगिनी एक दोस्त होने के नाते उन्हें सहारा दे रहा है. | इससे जुड़ी ख़बरें अंधेरी ज़िंदगी में उम्मीद की नई किरण23 जनवरी, 2008 | भारत और पड़ोस ट्रक चालकों को एड्स से बचाने की मुहिम29 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस एड्स और समाज से जूझती औरत27 सितंबर, 2007 | भारत और पड़ोस एड्स से लड़ने के लिए पैसे कम26 सितंबर, 2007 | पहला पन्ना यौन शिक्षा का विरोध करने वालों के तर्क25 अगस्त, 2007 | भारत और पड़ोस एचआईवी संक्रमित जोड़ियों की शादी03 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस एड्स पीड़ित महिला चुनावी मैदान में..08 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस एड्स से चिंतित चर्च की मनोरंजक पहल16 फ़रवरी, 2006 | मनोरंजन एक्सप्रेस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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