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सोमवार, 25 फ़रवरी, 2008 को 09:21 GMT तक के समाचार
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तब रेल बजट-आम बजट एक होते थे

भारतीय रेलवे
भारत में अंग्रेज़ों के समय ही रेल बजट आम बजट से अलग हो गया था
भारत में हर वर्ष आम बजट से दो दिन पहले रेल मंत्री संसद में रेलवे का बजट पेश करते हैं.

अब सवाल उठता है कि आख़िर सरकार का विभागीय उपक्रम होने के बावजूद रेलवे का बजट अलग से क्यों पेश किया जाता है.

इसके लिए भारत में बजट प्रणाली की शुरुआत को जानना ज़रुरी है.

वर्ष 1859 से पहले ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में 'बजट' नाम की कोई चीज नहीं थी.

उसी वर्ष भारत में ब्रिटिश वॉयसराय लॉर्ड केनिंग ने अपनी कार्यकारिणी में जेम्स विल्सन को बतौर वित्त विशेषज्ञ नियुक्त किया.

 इस लिहाज़ से रेल बजट आम बजट से अलग ज़रूर है लेकिन स्वतंत्र नहीं. रेल बजट के दो दिन बाद जब वित्त मंत्री आम बजट पेश करते हैं तो आय-व्यय के हिसाब किताब में रेलवे के आँकड़ें भी शामिल होते हैं
अरविंद घोष

उन्हीं की पहल पर 18 फ़रवरी 1860 को वॉयसरॉय की परिषद में पहली बार बजट पेश किया गया जिसमें रेलवे का लेखा-जोखा भी शामिल था. जेम्स विल्सन को ही भारत में बजट प्रणाली का जन्मदाता कहा जाता है.

इसके बाद ब्रिटिश शासन में रेलवे का तेज़ी से विकास हुआ और बढ़ते दायरे को देखते हुए वर्ष 1901 में तत्कालीन वॉयसरॉय लॉर्ड कर्ज़न ने रेलवे बोर्ड का गठन किया.

वर्ष 1921 में ब्रिटिश शासन ने एडवर्ड्थ कमेटी का गठन किया जिसकी सिफ़ारिश पर पहली बार रेल बजट को सामान्य बजट से अलग कर दिया गया.

कारण

रेलवे बजट अलग करने के पीछे मूल विचार यह था कि रेलवे से निश्चित अंशदान की व्यवस्था होने से सिविल अनुमानों में स्थिरता आएगी.

आज़ादी के बाद भी यही परंपरा कायम रही. धीरे-धीरे रेलवे का आकार बढ़ता भी बढ़ता गया जिससे अलग-अलग बजट प्रणाली की व्यवस्था को व्यावहारिक ज़रुरत के रुप में स्वीकार कर लिया गया.

लालू यादव यूपीए सरकार का आख़िरी रेल बजट पेश करेंगे

अभी भारतीय रेलवे दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी रेल प्रणाली है और इसमें किसी भी सरकारी विभाग से अधिक लगभग 14 लाख लोग काम करते हैं.

पत्रकार अरविंद घोष बताते हैं, "रेलवे के बजट का आकार भी काफी बड़ा हो गया है. पिछले साल सिर्फ़ किराए और भाड़े से 80 हज़ार करोड़ की आमदनी हुई. ऐसे में अलग बजट से रेलवे वित्त के प्रशासन में लचीलापन आता है."

हालाँकि रेलवे को हर वर्ष नए रेलवे ट्रैक बनाने और अन्य विकास कार्यों के लिए पैसा केंद्र सरकार से ही मिलता है जिसे बजटीय सहायता कहते हैं.

लेकिन यह मुफ़्त में नहीं मिलता बल्कि इस पर रेलवे को हर साल लगभग सात फ़ीसदी की दर से ब्याज़ देना पड़ता है जिसे 'डिविडेंड' कहते हैं.

अरविंद घोष बताते हैं, "वैसे डिविडेंड से लोग मतलब निकालते हैं मुनाफ़े में हिस्सा लेकिन यहाँ इसका अर्थ अलग है. अभी आम बजट से रेलवे को दी गई राशि लगभग 67 हज़ार करोड़ रुपए है जिस पर रेलवे को सात फ़ीसदी ब्याज यानी डिविडेंड देना पड़ रहा है."

वो कहते हैं, "रेल बजट आम बजट से अलग ज़रूर है लेकिन स्वतंत्र नहीं. रेल बजट के दो दिन बाद जब वित्त मंत्री आम बजट पेश करते हैं तो आय-व्यय के हिसाब किताब में रेलवे के आँकड़ें भी शामिल होते हैं."

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