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भोपाल गैस पीड़ितों की दिल्ली पदयात्रा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भोपाल गैस पीडितों ने पिछले लगातार तेईस वर्षों से अपने साथ हो रही 'अनदेखी' और 'नाइंसाफी' को उजागर करने और 'प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को उनके वायदे की याद दिलाने' के लिए 'दिल्ली चलो' का रास्ता ढूँढा है. क़रीब तीन हज़ार गैस पीडितों के दो जत्थे जल्दी ही दिल्ली जाकर धरने, प्रदर्शन और भूख हरताल करेंगे. सौ से अधिक लोगों का ऐसा ही एक ग्रुप बुधवार को लगभग आठ सौ किलोमीटर पदयात्रा करते हुए दिल्ली के लिए रवाना हुआ जबकि पीडितों का दूसरा समूह रेलगाड़ी से शुक्रवार को चलकर राजधानी पहुँचेगा. 2006 में गैस पीडितों की एक पदयात्रा और फिर दिल्ली के जंतर-मंतर पर लंबे धरने के बाद मनमोहन सिंह ने इस दल की मांग पर एक केंद्रीय समिति का गठन किया था और पीडितों के राहत और पुनर्वास के लिए एक विस्तृत योजना तैयार करने का वायदा किया था. इस योजना को दिसम्बर 2007 तक तैयार हो जाना था. स्वयंसेवी कार्यकर्ता रचना ढींगरा ने कहा की यह जत्था गुना, शिवपुरी, ग्वालियर, आगरा और मथुरा होते हुए मार्च के अन्तिम हफ्ते में दिल्ली पहुँचकर जंतर-मंतर पर धरना देगा और अगर ज़रूरत पड़ी तो अनिशचित कालीन भूख हड़ताल भी शुरू करेगा. तेईस साल पहले यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से हुए गैस रिसाव से सीधे प्रभावित पीडितों के अलावा इस पदयात्रा में अब बंद पड़ी फैक्ट्री के आसपास की बस्तियों में रहने वाले भी शामिल होंगे. कई अध्ययनों के अनुसार प्लांट में मौजूद रसायनिक कचरा भूतल में सालों से रिस रहा है जिससे आसपास के इलाके का भू जल ज़हरीला हो गया है लेकिन समीप की बस्तियों में रहने वाले लोग उसे ही पीने को मजबूर हैं. नए आँकड़े पीडितों और उनके परिवार के पुनर्वास की विस्तृत नीतियों के अलावा संगठनों की मांग है कि भारत सरकार यूनियन कार्बाइड और अब वर्तमान मालिक दाऊ कैमिकल्स के ख़िलाफ़ कानूनी कारवाई करे, दाऊ की भारत में व्यवसायिक गतिविधियों पर रोक लगाए, उससे प्लांट में मौजूद कचरे की सफ़ाई का ख़र्च मांगे और कचरे की मौजूदगी के कारण लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण को हुए नुक़सान की भरपाई करने को कहे.
पीडितों के साथ दुर्घटना के दिन से काम कर रहे अब्दुल जब्बार कहते हैं कि उनके साथ जा रहा यह समूह लोगों को यह बताना चाहता है मुआवज़े के नाम पर पीडितों को जो रक़म मिली है वो नाम मात्र की है क्योंकि दुर्घटना में मारे जाने और उससे प्रभावित लोगों की संख्या में पाँच गुना इज़ाफ़ा हो गया है. 1989 में यूनियन कार्बाइड से सात अरब 15 करोड़ रुपए का जो समझौता हुआ था वह इस आधार पर था कि गैस रिसाव से तीन हज़ार लोगों की मौत हुई थी और एक लाख बीस हज़ार लोग घायल हुए थे. चार साल पहले जो आधिकारिक आंकडों आए उनके अनुसार अब तक इस दुर्घटना में मारे गए लोगों की संख्या पन्द्रह हज़ार होने और पाँच लाख से अधिक के पीड़ित होने का मामला सामने आया है. गैस पीडितों के साथ काम कर रही संस्थाओं का दावा है कि उनसे सहानभूति रखने वाली संस्थाएं उनके समर्थन में देश भर में रैलियों, बैठकों और हस्ताक्षर अभियानों का आयोजन कर रही हैं. साथ ही अमरीका और ब्रिटेन में स्थित भारतीय दूतावासों पर भी उनके समर्थक विरोध प्रदर्शन करेंगे. | इससे जुड़ी ख़बरें गैस पीड़ितों की याचिकाएँ ख़ारिज04 मई, 2007 | भारत और पड़ोस एक कठिन संघर्ष का दुखद अंत18 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस दिल्ली में गैस पीड़ितों का अनशन11 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस दिल्ली और भोपाल में विरोध प्रदर्शन10 फ़रवरी, 2006 | भारत और पड़ोस यूनियन कार्बाइड और डाउ का बयान01 दिसंबर, 2004 | भारत और पड़ोस गैस कांड मुआवज़े का वितरण शुरू हुआ17 नवंबर, 2004 | भारत और पड़ोस 'बची हुई राशि भी गैस पीड़ितों को दें'19 जुलाई, 2004 | भारत और पड़ोस गैस कांड और मुआवज़े का विवाद19 जुलाई, 2004 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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