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बुधवार, 01 दिसंबर, 2004 को 13:53 GMT तक के समाचार
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यूनियन कार्बाइड और डाउ का बयान
वारेन एंडरसन
यूनियन कार्बाइड के तात्कालीन प्रमुख वारेन एंडरसन
बीबीसी ने “ भोपाल में एक रात’’ नाम से एक कार्यक्रम किया.

गैस त्रासदी की बीसवीं बरसी के अवसर पर बने इस कार्यक्रम के सिलसिले में बीबीसी ने डाउ केमिकल और यूनियन कार्बाइड के सामने कुछ सवाल रखे और उनके दोनों कंपनियों ने जवाब भेजे.

1999 में डाउ केमिकल ने यूनियन कार्बाइड को 11 अरब 60 करोड़ डॉलर में ख़रीदने का समझौता किया. 2001 में डाउ केमिकल दुनिया की बड़ी केमिकल कम्पनियों मे से एक हो गई.

यूनियन कार्बाइड अब डाउ केमिकल की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कम्पनी बन गई है.

डाउ केमिकल का पूरा जवाब

क्या डाउ केमिकल भविष्य में अमरीका या भारत में होने वाली किसी क़ानूनी कार्रवाई में सहयोग करेगी?

सबसे पहले तो यह याद रखना ज़रुरी है कि भोपाल का कारखाना न कभी हमारे पास था और न कभी हमने उसका संचालन ही किया. कम्पनी का 1984 में गैस रिसाव की दुखद घटनाओं से न कोई संम्बंध है और न कोई क़ानूनी दायित्व ही बनता है.

इस दुखद घटना के 16 साल, यूनियन कार्बाइड और भारत के उच्चतम न्यायालय के बीच क़ानूनी समझौता होने के 10 साल और मध्य प्रदेश की राज्य सरकार द्वारा इस कारखाने का नियंत्रण लेने के 2 साल बाद ही हमने यूनियन कार्बाइड के शेयर लिए थे.

जहाँ तक विशेष क़ानूनी कार्रवाई की बात है तो उदाहरण के तौर पर हाल ही में डाउ इंडिया को यह स्पष्ट करने के लिए कोर्ट में बुलाया गया था कि कोर्ट डाउ पर और डाउ यूनियन कार्बाइड पर भोपाल कांड के संम्बध में कार्रवाई करने के लिए दबाव क्यों नहीं डाल सकती.

डाउ इंडिया कोर्ट में उपस्थित हुई और स्पष्ट किया कि उसके पास यूनियन कार्बाइड को निर्देश देने का कोई अधिकार नहीं हैं. न्यायालय ने इस बात को समझा है और हम उनके फैसले का इंतज़ार कर रहे है.

क्या भोपाल के लोगों की आर्थिक या किसी अन्य तरीके से और सहायता करने के लिए डाउ केमिकल के पास कोई योजना है?

फिर से यह बात याद रखना महत्वपूर्ण है कि डाउ केमिकल ने न तो भोपाल कारखाने को चलाया और न ही उसके मालिक रहे और इस दुःखद घटना के लिए हमारी कोई ज़िम्मेवारी नहीं है. फिर भी हमने पूरी इंड़स्ट्री के साथ इस घटना से सबक सीखे हैं और इस तरह की दुखद घटनाएँ फिर से न हों, यह सुनिश्चित करने के लिए जो कुछ हम कर सकते थे हमने करने की कोशिश की है.

 डाउ केमिकल ने न तो भोपाल कारखाने को चलाया और न ही उसके मालिक रहे और इस दुःखद घटना के लिए हमारी कोई ज़िम्मेवारी नहीं है. फिर भी हमने पूरी इंड़स्ट्री के साथ इस घटना से सबक सीखे हैं और इस तरह की दुखद घटनाएँ फिर से न हों, यह सुनिश्चित करने के लिए जो कुछ हम कर सकते थे हमने करने की कोशिश की है.

भारत में भी हम लोकहित के कार्य करते हैं, जैसा कि दुनिया भर में लोगों के बीच जहाँ हम काम करते और रहते है, करते हैं. यह प्रयास विशेष रुप से भोपाल के लिए नहीं हैं क्योंकि यहाँ हमारे पास न कोई कारखाना है और न हम किसी कारखाने का संचालन ही करते हैं.

डाउ केमिकल ने, भोपाल गैस कांड को देखते हुए, विदेशों में अपनी सहायक कम्पनियों के संचालन के लिए अपनी नीति मे क्या परिवर्तन किए हैं?

हालांकि डाउ केमिकल पर भोपाल की कोई जवाबदेही नहीं है, हम उस घटना को नहीं भूले हैं, इसीलिए ‘रेस्पांसिबल केयर’ की स्थापना की गई थी और इसीलिए यह मानक हमारे कर्मचारियों और समुदाय के लोगों, जहाँ हम काम करते रहते हैं, की सुरक्षा के लिए ज़रुरी है. हम प्रतिबद्ध हैं कि विश्व भर में जहाँ हम व्यवसाय करते हैं वहाँ “ रेस्पांसिबल केयर प्रोग्राम ” को पूरी तरह से लागू कराया जाए.

क्या डाउ विदेशों में काम कर रहे बहुराष्ट्रीय निगमों के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों के विकास में सहयोग करेगी, जैसे मानकों पर 2002 में, जोहानसबर्ग में हुए पृथ्वी शिखर सम्मेलन के दौरान विचार-विमर्श किया गया था?

डाउ केमिकल पहले से ही अमरीका और पूरी दुनिया में “रेस्पांसिबल केयर प्रोग्राम” के माध्यम से ऐसे मानकों का पालन कर रही है. डाउ “रेस्पांसिबल् केयर प्रोग्राम” को विश्व भर में लागू करवाने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है, और हम पूरी केमिकल इंडस्ट्री से भी ऐसा करने को कहते रहेगें. रेस्पांसिबल केयर केमिकल इंडस्ट्री के लिए एक स्वीकार्य मानक है.

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यूनियन कार्बाइड का पूरा जवाब

क्या यूनियन कार्बाइड को विश्वास है कि भोपाल के लोगों को गैस लीक होने के कारण जो आर्थिक, मानसिक और स्वास्थ संम्बधी परेशानियाँ उठानी पड़ी उसके लिए दिया गया मुआवज़ा उचित है?

गैस रिसाव के तुरंत बाद यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन ने पीड़ितों को सहायता पहुँचाना शुरु कर दिया था और उनके दावों के निपटारे की प्रक्रिया स्थापित कर दी थी. दुर्धटना के बाद यूनियन कार्बाइड ने स्थिति को संम्भालने के कई प्रयासों में से कुछ थे:
1.कर्मचारियों के लिए भोपाल राहत कोष की स्थापना जिसमें 50 लाख डॉलर से भी ज़्यादा की रकम तुरंत राहत कोष में रखी गई. स्थानीय चिकित्सकों के साथ काम करने और उपचार के बेहतरीन तरीक़ों का पता लगाने के लिए प्रमुख चिकित्सा विशेषज्ञों की एक टीम का गठन करना.
2.पीड़ितों को पर्याप्त मात्रा में चिकित्सकीय उपकरण, खाद्य सामग्री और जानकारी मुहैया करवाना, 3.पीड़ितों के लिए अस्पताल बनवाने के लिए 100 करोड़ डॉलर का एक धर्मार्थ ट्रस्ट कोष स्थापित करना.

 1989 में यूनियन कार्बाइड और यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड ने भारत सरकार के साथ 47 करोड़ डालर का क़ानूनी समझौता किया था, जिससे इस धटना से उत्पन्न सभी दावों का निपटारा हो गया था

4.कारखाने में सफाई अभियान की शुरुआत ताकि आगे होने वाले नुक़सान को रोका जा सके.
5.स्थानीय तौर पर रोज़गार उपलब्ध कराने के लिए 22 लाख डॉलर की सहायता से एक व्यवसायिक तकनीकी केन्द्र खोलने का प्रस्ताव.

क्या यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन किसी भावी क़ानूनी कार्रवाई में भाग लेगी?

1989 में यूनियन कार्बाइड और यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड ने भारत सरकार के साथ 47 करोड़ डालर का क़ानूनी समझौता किया था, जिससे इस धटना से उत्पन्न सभी दावों का निपटारा हो गया था.
इस समझौते का भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा समर्थन किया गया था जिसने इसे न्यायसंगत, उचित और पर्याप्त बताया था. यूनियन कार्बाइड और यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड ने भारत सरकार को यह रकम तुरंत दे दी थी. यूनियन कार्बाइड के खिलाफ अब कोई क़ानूनी दावा बाकी नहीं है.

भोपाल में यूनियन कार्बाइड के कारखाने से अब भी हो रहे प्रदूषण के लिए क्या यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन की कोई ज़िम्मेदारी बनती है?

इस घटना के बाद यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड ने भारत की केन्द्र और राज्य सरकारों के अधिकारियों के निर्देशन में कारखाने में सफाई अभियान शुरु कर दिया था. 1994 में यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड के शेयरों की बिक्री के बाद नयी कम्पनी एवररेडी इन्डस्ट्रीज़ इंडिया लिमिटेड ने 1998 तक यह अभियान जारी रखा.
1998 में मध्य प्रदेश सरकार ने इस कारखाने को अपने नियंत्रण में ले लिया और आगे के कार्यों को पूरा करने का सारा दायित्व भी संभाल लिया. मीडिया की रिपोर्टो के अनुसार उस समय के बाद से कोई सफाई कार्य नहीं हुआ है.

1985 में गैस रिसाव के दौरान, जिस तरह से तोड़फोड़ को इसका कारण बताया गया था. क्या यूनियन कार्बाइड अब भी उस मत पर क़ायम है?

हाँ. जाँच से यह पता चला है कि उपयुक्त तकनीक और कारखाने की जानकारी रखने वाला कोई कर्मचारी ही टैंक से छेड़छाड़ कर सकता था. एक इंजीनियर परामर्शदाता फ़र्म आर्थर. डी. लिटिल की ओर से की गई स्वतंत्र जाँच से सामने आया है कि टैंक में पानी सिर्फ जानबूझ कर ही छोड़ा जा सकता था. चूंकि सारे सुरक्षातंत्र सही और चालू हालत में थे, वो पानी को टैंक में जाने से रोक सकते थे.

भोपाल गैस कांड से क्या सबक सीखे गए?

यूनियन कार्बाइड और केमिकल इंड़स्ट्री ने इस दुःखद घटना से कई महत्वपूर्ण सबक लिए हैं, उनमें से कुछ इस तरह से हैं:

आपातकालीन घटनाओं से निपटने के लिए आकस्मिक योजनाएँ तैयार रखना. स्वास्थ, सुरक्षा और पर्यावरण प्रबंध के कार्यक्रमों में सुधार करना, जोख़िम प्रबंधन के कार्यक्रमों में आम लोगों को शामिल करना, कारखानों में ख़तरनाक रसायनों का कम स्टाक रखना. उत्पादन में कम ख़तरनाक रसायनों का इस्तेमाल करना या अलग तरह की उत्पादन प्रक्रिया अपनाना जिसमें कम ख़तरनाक रसायनों की ज़रुरत पड़ती है. उन कारखानों को जिनमें ख़तरनाक रसायनों का इस्तेमाल होता है उन्हें चारों ओर से हरित क्षेत्र से घेरना. इस तरह के उपायों का विकास करना जो किसी ऐसी दुर्घटना के प्रभावों का निर्धारण कर सकें और फिर उन प्रभावों को कम कर सकें जो आसपास के क्षेत्रों पर प्रभाव डाल सकते हों. दुर्घटना की गंभीरता को कम करने वाले प्रयासों का मूल्यांकन. सुरक्षा प्रणाली की सुव्यवस्था बनाए रखना. “ थ्रैट आफ वायलैंस कार्यक्रमों ” को स्थापित करना.

भावी वैज्ञानिक जाँच में सहायता के लिए क्या यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन उस रात भोपाल में टैंक नम्बर ई-610 से लीक हुई गैसों और दूषित तत्वों का विवरण सामने लाएगा?

ऐसा पहले ही किया जा चुका है. इस दुखद घटना के दिन यूनियन कार्बाइड ने मिथाईल आइसो-साईनाइड गैस के तकनीकी विशेषज्ञों की एक टीम भेज दी थी जिन्होंने इस गैस पर अध्ययन किए थे.
भोपाल पहुँचने के तुरंत बाद उन्होंने वो जानकारी वहाँ के वैज्ञानिकों और चिकित्सकों को दी थी. उस समय मिथाईल आइसो-साईनाइड गैस की विषाक्तता पर सभी तरह की प्रकाशित और अप्रकाशित जानकारी उपलब्ध कराई गयी थी.

यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन ने पीड़ितों का उपचार करने और गैस के संम्पर्क में आने से पड़ने वाले दूरगामी प्रभावों को पहचानने और उनका उपचार करने के लिए पर्याप्त मात्रा में विशेष जानकारी मुहैया करवाई थी.

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