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'बची हुई राशि भी गैस पीड़ितों को दें' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दो दिसंबर 1984 की रात को भोपाल में हुई गैस त्रासदी के कुछ प्रभावितों को राहत पाने के लिए बीस साल का इंतज़ार करना पड़ा है. अब सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को भोपाल में हुए गैस हादसे के उन प्रभावितों को मुआवज़े की बची हुई क़रीब 15 सौ करोड़ रुपए की राशि तुरंत बाँटने का निर्देश दिया है जिन्हें अभी तक मुआवज़ा नहीं मिला था. ग़ौरतलब है कि मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में 1984 मे एक अमरीकी कंपनी यूनियन कार्बाईड से ज़हरीली गैस रिसने से हज़ारों लोगों की मौत हो गई थी. पाँच लाख से ज़्यादा लोगों पर उसका बहुत बुरा असर पड़ा था जिससे बहुत से लोग विकलांग हो गए. उस हादसे में बहुत से लोग इस तरह से प्रभावित हुए थे कि तरह-तरह की बीमारियों के भी शिकार हो गए. अमरीकी कंपनी यूनियन कार्बाइड ने भारत सरकार के साथ इस मामले को निबटाने के लिए 1989 में 47 करोड़ डॉलर दिए थे और इस धन को भारतीय रिज़र्व बैंक के पास जमा करा दिया गया था. उसमें से कुछ प्रभावितों को तो मुआवज़ा दे दिया गया था लेकिन कुछ प्रभावितों को राशि दिए जाने पर विवाद खड़ा हो गया था. तब से यह धन बैंक में ही जमा है और उसका ब्याज मिलाकर अब वह क़रीब 15 अरब रुपए बन चुका है. न्यायालय ने अब सरकार से कहा है कि इस धन को प्रभावितों में बाँट दिया जाए. इन प्रभावितों में वे उन लोगों के निकट संबंधी शामिल हैं जो उस हादसे में या तो मारे गए थे या घायल हो गए थे. प्रभावितों की तरफ़ से यह मुक़दमा लड़ने वाले एक वकील एस मुरलीधरन न्यायालय के आदेश से ख़ुश तो हैं लेकिन मायूस भी. एस मुरलीधरन कहते हैं, "न्यायालय के आदेश और उसके लागू होने में हमेशा ही बड़ा अंतर होता है इसलिए अभी तो इंतज़ार ही किया जा सकता है." न्यायालय ने भोपाल के गैस राहत कोष के कल्याण आयुक्त को यह निर्देश भी दिया है कि प्रभावितों में बाँटे जाने वाले धन का पूरा हिसाब-किताब मुहैया कराएँ. न्यायालय ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए दो महीने बाद का समय निर्धारित किया है. गैस हादसे के प्रभावित लोग मुआवज़े की राशि बढ़ाए जाने की माँग करते रहे हैं जिसके लिए उन्होंने दिल्ली में भी कई बार प्रदर्शन किए. |
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