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एक कठिन संघर्ष का दुखद अंत | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भोपाल गैस त्रासदी का दंश झेल चुके और पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए संघर्ष करने वाले 34 वर्षीय सुनील कुमार की लाश भोपाल में उनके घर में पंखे से लटकी हुई मिली. उस समय उन्होंने अपना पसंदीदा टी-शर्ट पहना था, जिस पर लिखा था, ‘‘और भोपाल नहीं.’’ 1984 में यूनियन कार्बाइड गैस कांड में सुनील बच तो गए लेकिन बाद में गंभीर मानसिक बीमारी स्क्रित्ज़ोफिनिया के शिकार हो गए. त्रासदी के बाद से ही सुनील पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए संघर्ष करते रहे लेकिन सपना पूरा किए बिना ही दुनिया से विदा हो गए. भोपाल ग्रुप फॉर इनफॉरमेशन एंड एक्शन (बीजीआईए) के अध्यक्ष और नजदीकी मित्र सत्यनाथ सारंगी कहते हैं, ‘‘सुनील मानते थे कि गैस त्रासदी के लिए जिम्मेदार लोगों को कठोर सज़ा दी जानी चाहिए.’’ 1985 में सुनील ने एक इंटरव्यू में कहा था, ‘‘लोगों को यह पता चलना चाहिए कि त्रासदी के लिए कौन जिम्मेदार हैं और उनके अपनों का हत्यारा कौन है. इसके लिए जो भी जिम्मेदार पाए जाएँ, उन्हें फाँसी की स़जा दी जानी चाहिए.’’ हालांकि, इस मामले में अब तक किसी के ऊपर मुकदमा तो नहीं चलाया जा सका लेकिन सुनील ने फाँसी लगा ली. मुश्किल से बचे सुनील के पिता बढ़ई थे और परिवार के साथ भोपाल के जेपी नगर में रहते थे. इस इलाके के नजदीक ही यूनियन कार्बाइड की इकाई थी.
दुर्घटना की स्याह रात सुनील का परिवार मिथाईल आइसो साइनाइट का विषैला बादल आकाश से नीचे आते देख दहशत में वहां से भाग निकला. इस दौरान परिवार के सभी सदस्य अलग- अलग हो गए. आँखों में चुभन और सीने में दर्द लिए सुनील बस से होशंगाबाद पहुँच गया. वहीं उसने अपना इलाज करवाया. एक सप्ताह बाद सुनील जब भोपाल लौटा तो उसके माता-पिता, तीन बहनें और दो भाई मर चुके थे जबकि दुर्घटना में बचे एक छोटे भाई और छोटी बहन की जिम्मेदारी 13 साल के सुनील पर आ गई थी. अभियान अपने भाई और बहन को पीड़ितों के लिए बने अनाथालय भेजकर सुनील ने न्याय की लंबी लड़ाई के लिए कमर कस ली. सुनील और उसका घर गैस त्रासदी से अनाथ हुए और शोषित बच्चों का सहारा बन गया. 1987 में उन्होंने ‘‘चिल्ड्रेन एगेंस्ट कार्बाइड’’ संस्था बनाई जबकि 1986 में भारत सरकार ने सुनील को गैस रिसाव मामले की सुनवाई में गवाही देने के लिए न्यूयॉर्क भेजा. भारत सरकार और यूनियन कार्बाइड में हुए समझौते के खिलाफ समर्थन जुटाने के लिए 1989 में सुनील ने कई देशों की यात्रा की. यूनियन कार्बाइड की सालाना बैठक के दौरान पर्यावरण रिपोर्ट पढ़ने की कोशिश करते हुए गिरफ़्तार किए गए पर बाद में रिहा कर दिए गए. 1997 में सुनील मानसिक बीमारी के शिकार हो गए और दिनोंदिन सि्थति ख़राब होती गई. कई बार उन्होंने आत्महत्या की भी कोशिश की. सुनील ने जहाँ फाँसी लगाई, वहाँ एक नोट भी मिला. उसमें लिखा है, "मैं मानसिक बीमारी के कारण खु़दकुशी नहीं कर रहा हूँ, बल्कि पूरे होशोहवास में ऐसा कर रहा हूँ." सारंगी बताते हैं कि सुनील की मौत के बाद हॉलैंड और अमेरिका सहित कई देशों के लोग उनकी याद में मानसिक स्वास्थ्य केंद्र बनाने के लिए आगे आए हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें मुआवज़े बाँटने के लिए एक साल और25 अप्रैल, 2005 | भारत और पड़ोस शोक सभाएं होती रहीं, मुआवज़ा नहीं03 दिसंबर, 2004 | भारत और पड़ोस भोपाल त्रासदी की बरसी पर शोकसभाएँ03 दिसंबर, 2004 | भारत और पड़ोस मुआवज़े को लेकर राजनीतिक विवाद01 दिसंबर, 2004 | भारत और पड़ोस बीस साल बाद कातिल कारखाने का दौरा01 दिसंबर, 2004 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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