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मुआवज़े को लेकर राजनीतिक विवाद | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सुप्रीम कोर्ट ने इस वर्ष 26 अक्तूबर को भारतीय जनता पार्टी के उस आवेदन को ख़ारिज कर दिया जिसमें उसने भोपाल के बाकी बचे 20 वार्डों के नागरिकों को गैस राहत का मुआवजा आवंटित करने का आग्रह किया था. इन 20 वार्डों के अधिकांश नागरिक उच्च-मध्यमवर्गीय हिंदू हैं, जिन्हें भाजपा का परंपरागत वोट माना जाता है. हालांकि भाजपा इस बात से इंकार करती है कि उसकी मांग के पीछे यह कोई कारण है. दरअसल यह विवाद शुरु से ही रहा है कि आख़िर कुल कितने वार्ड इस भीषण त्रासदी का शिकार हुए थे. जब हादसा हुआ उस समय भोपाल 56 वार्डों में बंटा हुआ था. हादसे के शुरुआती वर्षों में भ्रम की स्थित बनी रही क्योंकि गैस से प्रभावित लोगों की कोई प्रामाणिक सूची ही नहीं बन पाई थी. हालांकि भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने विस्तृत अध्ययन के बाद 56 में से 36 वार्डों की पहचान गैस से प्रभावित वार्डों के रूप में की थी. सरकार ने संसद में एक विधेयक पारित कर गैस प्रभावितों के दावों को निपटाने की ज़िम्मेदारी अपने हाथ में ले ली थी. उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार और यूनियन कार्बाइड के बीच 1989 में विवाद का निपटारा करते हुए बतौर मुआवज़ा, तकरीबन 33 अरब, 75 करोड़ रूपए की राशि तय कर दी. साथ ही उसने यह रकम भारतीय रिजर्व बैंक में डालर के रूप में जमा कराने के निर्देश दिए. सुप्रीम कोर्ट ने दावों का निपटारा करते हुए अप्रैल 1990 से गैस पीड़ितों को दो सौ रुपये प्रति माह की दर से भुगतान करने के निर्देश दिए थे. राजनीति आईसीएमआर द्वारा पहचाने गए 36 वार्डों के नागरिकों को अंतरिम राहत पाने का हकदार माना गया लेकिन, इसके बाद मुआवजे को लेकर राजनीति शुरू हो गई. भाजपा ने 1990 के विधानसभा चुनाव में यह मुद्दा उठाया. उसने अपने घोषणापत्र में लिखा कि गैस त्रासदी के पाँच बरस बाद भी पीड़ितों को वादों के अलावा कुछ नहीं मिला. उसने गैस पीड़ितों के लिए उचित कदम उठाने के साथ ही पुनर्वास के काम में तेजी लाने का वादा भी किया. चुनाव जीतने और सरकार बनाने के बाद भाजपा के रूख़ में बदलाव आ गया. इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि जिन 36 वार्डों की शिनाख्त गैस प्रभावित वार्डों के रूप में की गई थी, उनमें से अधिकाँश मुस्लिम बहुल्य हैं और इन्हें कांग्रेस का परंपरागत गढ़ माना जाता है जबकि बाकी के 20 वार्ड हिंदू बहुल्य हैं जो परंपरागत रूप से भाजपा का समर्थन करते रहे हैं. लिहाजा भाजपा ने सारे वार्डों को गैस प्रभावित के रूप में मान्यता दिलाने के लिए अभियान छेड़ दिया. भाजपा ने कहा कि बाकी के 20 वार्डों के लोगों को दो सौ रुपये प्रति माह की अंतरिम राहत भी दी जाए. सुंदरलाल पटवा के नेतृत्व वाली तत्कालीन भाजपा सरकार ने केंद्र सरकार से इसके लिए औपचारिक रूप से आग्रह किया, लेकिन केंद्र सरकार ने इसे ख़ारिज कर दिया. मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा ने जनवरी,1991 में केंद्रीय पेट्रोलियम और रसायन मंत्री को भोपाल गैस पीड़ितों के पुनर्वास से संबंधित एक एक्शन प्लान दिया. इसमें कहा गया था, “20 वार्डों में भी अंतरिम राहत बांटे जाने संबंधी दावे कमजोर हैं, लेकिन यह मसला राजनीति से जुड़ा हुआ है और सरकार इसकी उपेक्षा नहीं कर सकती.” इसके बाद से भाजपा के लिए यह एक बड़ा मुद्दा बन गया. मौजूदा मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर, सुंदरलाल पटवा की सरकार में भोपाल गैस त्रासदी राहत और पुनर्वास मंत्री थे. उन्होंने 20 वार्डों के मामले में कांग्रेस के वरिष्ट नेता अर्जुन सिंह का भी समर्थन हासिल कर लिया था. इसी वजह से मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने 9 जुलाई 1991 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव को पत्र लिखकर राहत राशि के दायरे में बाकी के 20 वार्डों को भी शामिल करने का आग्रह किया था. मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव और भोपाल से चार बार लोकसभा का चुनाव जीतने वाले सुशील चंद्र वर्मा के लिए तो यह मुख्य चुनावी मुद्दा रहा है. इस वर्ष जुलाई में सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार को बकाया मुआवज़ा राशि गैस पीड़ितों में बांटने का निर्देश देने के बाद एक बार फिर भाजपा की उम्मीदें जाग गई. इसके बाद मध्यप्रदेश भाजपा के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी ने बाकी के 20 वार्डों के नागिरकों को भी मुआवजा देने की सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई. लेकिन, 26 अक्तूबर को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी. |
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