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बुधवार, 01 दिसंबर, 2004 को 08:43 GMT तक के समाचार
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राजनीतिक उदासीनता में खो गया मामला

एक प्रदर्शनकारी
भोपाल गैस त्रासदी को लेकर राजनीतिक दलों ने कोई बड़ा आंदोलन खड़ा नहीं किया
भोपाल रवाना होने से पहले जब राज्य के एक शीर्ष कांग्रेस नेता से दिल्ली में मुलाक़ात के दौरान मैंने उन्हें बताया कि मैं भोपाल गैस त्रासदी की बीसवीं बरसी पर विशेष कार्यक्रम के सिलसिले में भोपाल जा रहा हूँ तो उन्होंने आश्चर्य से कहा, "भोपाल गैस ट्रेजेडी- अरे वह तो ग्रीनपीस का रैकेट है."

बाकी राजनीतिज्ञ और राजनीतिक पार्टियाँ शायद इतने खुले तौर पर यह बात न कहें लेकिन उनका रवैया इससे कुछ बहुत अलग नहीं.

कुछ तो भारतीय जनता पार्टी पर इस मानवीय त्रासदी को भी सांप्रदायिक रंग देने का आरोप लगाते हैं और कुछ लोग कांग्रेस की भूमिका को संदिग्ध दृष्टि से देखते हैं.

गैस पीड़ितों को चिकित्सा प्रदान करने वाली संस्था संभावना ट्रस्ट के प्रबंध ट्रस्टी सतीनाथ सारंगी कहते हैं, "आंकड़े बताते हैं कि गैस पीड़ितों के बीच 45 प्रतिशत ही मुस्लिम हैं और बाकी 55 प्रतिशत हिन्दू हैं. लेकिन भाजपा ने इस मामले को सिर्फ मुसलमानों का मान लिया है."

भाजपा की राज्य इकाई के अध्यक्ष कैलाश जोशी गैस पीड़ितों के मामले के सांप्रदायिककरण के आरोप को ग़लत बताते हैं.

उनका कहना था, "यह आरोप बिल्कुल ग़लत है. हम लोगों ने गैस पीड़ितों के लिए अपना एक मोर्चा बनाया था. उसके लिए हम लड़े हैं. हम लोग प्रारंभ से इस बात के पक्ष में थे कि जो गैस प्रभावित हैं, उन्हें मुआवज़ा मिलना चाहिए और यह बात हमने ही नहीं, कल्याण आयुक्त ने भी मानी थी."

ग़ौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जिन गैस पीड़ितों को मुआवज़ा दिया गया था, उसमें यूनियन कार्बाइड फैक्टरी से दूर पड़ने वाले 20 वार्ड शामिल नहीं थे.

इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च द्वारा तैयार किए गए एक सर्वेक्षण में भी इन क्षेत्रों को प्रभावित नहीं बताया गया है. मुख्य रुप से यही सर्वेक्षण मुआवज़ा वितरण का आधार बताया जाता है.

कांग्रेस पर आरोप

हादसे के समय राज्य में कांग्रेस पार्टी की सरकार थी.

उन पर इस पूरे मामले को बिगाड़ने और यूनियन कार्बाइड प्रबंधन को मदद करने का आरोप बार-बार लगता रहा है. यहाँ तक की यूनियन कार्बाइड चैयरमैन वार्स एन्ड्रू को समय पर गिरफ्तार न कर पाने का भी.

लेकिन कांग्रेसियों से यह बात कहें तो वह गैस पीड़ितों के लिए पार्टी द्वारा की गई सेवाओं की लम्बी लिस्ट गिनवाते हैं.

वारेन एंडरसन
आरोप है कि वारेन एंडरसन को राजनीतिक संरक्षण दिया गया

कांग्रेस की प्रदेश इकाई के महासचिव और प्रवक्ता मानक अग्रवाल कहते हैं, "कांग्रेस पार्टी का नज़रिया बहुत मजबूत रहा था. जिस समय गैस रिसाव हुआ था, उस समय अर्जुन सिंह यहाँ मुख्यमंत्री थे. उन्होंने प्रभावित क्षेत्रों को खाली करवाया और वहाँ गैस के जो अंश थे उसको भी नष्ट करवाया. मोतीलाल वोरा के समय स्वास्थ्य और पुर्नवास के क्षेत्र में बड़े काम हुए."

पूर्व मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा द्वारा गैस पीड़ितों की जीविका और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को सुलझाने के प्रयास की तारीफ़ गैस पीड़ितों के बीच काम कर रही स्वयंसेवी संस्थाएँ भी करती हैं.

इस कांड के अब तक के कुछ तथ्यों पर निगाह डालने पर राजनीतिक पार्टियों और राजनेताओं की भूमिका और भी साफ हो जाती है.

सबसे पहले तो राज्य और केन्द्र में मौज़ूद सरकारों ने दुर्घटना में मर गए और जिंदगी भर के लिए प्रभावित लोगों को अपनी ओर से कोई मुआवज़ा नहीं दिया.

गैस पीड़ितों को जो मुआवज़ा मिला है वह कारबाईड द्वारा दी गई राशि से ही दिया गया है. और बाद में यूनियन कारबाईड के खिलाफ चल रहे मामले को नर्म कर दिया गया.

ऐसी एक लम्बी फेहरिस्त बन सकती है. जो राजनेताओं के ख़िलाफ़ जाएगी.

उदासीनता

लेकिन इन मुद्दे पर देश की अन्य राजनीतिक पार्टियाँ जैसे वामपंथी दलों ने क्या किया? जबकि वह और उनसे जुड़ी संस्थाएँ इस क्षेत्र में बहुत सक्रिय थीं.

क्या इस कारण से कि पर्यावरण, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ इत्यादि का मुद्दा अभी भी आम भारतीयों को सांप्रदायिकता जितना नहीं झिंझोड़ता.

 राजनीतिक पार्टियों ने अपनी इस उदासीनता से एक ऐसा अवसर खोया है जो एक व्यापक आंदोलन बन सकता था
विश्लेषकों का मत

मध्य प्रदेश यूनिट के मेंबर सक्रेट्री प्रमोद प्रधान कहते हैं, "भोपाल गैस पीड़ित सहयोग समिति जो दिल्ली में गठित हुई और जिसके आधार पर हम यहाँ भी काम कर रहे हैं. जो संगठन सबसे आगे है उसमें जनवादी महिला समिति है. समिति 1989 से गैस पीडितों का मामला उठा रही है. अब यह बात अलग है कि अगर आप भोपाल की तुलना गुजरात के दंगों से करते हैं तो यह ठीक नहीं है. क्योंकि हर मामले की अपनी अलग अहमियत है."

लेकिन एक तथ्य यह भी है कि वामपंथी पार्टियों की मौजूदगी इस प्रदेश में नगण्य है. लेकिन यह मुद्दा राष्ट्रस्तर पर लगातार क्यों नहीं उठाया जाता रहा -जैसे की गुजरात.

इस पूरे मामले पर पिछले 20 सालों से निगाह रखने वाले जानकारों का मानना है कि राजनीतिक पार्टियों ने अपनी इस उदासीनता से एक ऐसा अवसर खोया है जो एक व्यापक आंदोलन बन सकता था.

वे कहते हैं कि यह मामला सिर्फ एक दुर्घटना का नहीं था बल्कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा कथित तीसरी दुनियाँ में निम्न स्तरीय टेक्नॉलॉजी के प्रयोग का और वृह्त तौर पर आर्थिक साम्राज्यवाद का.

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