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बीस साल बाद कातिल कारखाने का दौरा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अगर साथ में कोई स्थानीय आदमी न हो तो आपको पता भी न चलेगा कि आप यूनियन कार्बाइड फ़ैक्टरी के सामने खड़े हैं. कहीं कोई साइन बोर्ड नहीं लगा है. फाटक के किनारे एक नोटिस बोर्ड लगा है. लिखा है- बिना अनुमति के प्रवेश निषेध है. प्रवेश के लिए कलक्टर भोपाल की अनुमति चाहिए. एक गेट पार करने के बाद दिखता है कि दूसरे गेट पर होमगार्ड के जवान तैनात हैं. इस सुनसान और डरावने कारखाने की सुरक्षा के लिए. 90 एकड़ परिसर में फैली यूनियन कार्बाइड का यह कारखाना अब सरकार के कब्ज़े में है. कभी यूनियन कारबाइड में काम कर चुके टी.आर.चौहान को तो ख़ैर हम साथ लेकर आए हैं. यह समझने के लिए कि क्या हुआ था 2 दिसंबर 1984 की रात और 3 दिसम्बर की भोर में. चौहान साहब ने एक किताब भी लिखी है- भोपालः द इनसाइड स्टोरी. जंगल और डर लेकिन पाँच-छः लोगों के हमारे ग्रुप, जिसमें एक बंदूकधारी सिपाही भी हैं बड़ी-बड़ी मूँछोवाला लेकिन एक डर का एहसास सा है भीतर कहीं. नहीं इस जंगल से नहीं जो आदमकद हो गया है. मैं इसमें घुस सकता हूँ. मुझे डर है तो बस उस मिथाइल आइसोनाइनेट का जो फ़ैक्ट्री से उस रात लीक हुई थी.
चौहान साहब की बातों ने मेरी घबराहट और बढ़ा दी है. क्या पता ज़हरीली गैस अभी भी किसी सूरत में मौजूद हो यहाँ. करीब आधा किलोमीटर चलने पर एक प्लाट सामने दिख रहा है. कलपुर्जे और बहुत सारे पाईप एक दूसरे से गुत्थम-गुत्था. ठीक गैस त्रासदी की गुत्थी की तरह. सामने एक ढेर है. भूरे और कुछ काले ठोस पदार्थों का. एक कंटेनर से निकलकर बाहर बिखर गया है. ऐसा हज़ारों टन मटीरियल यूनियन कारबाईड की बंद पड़ी फ़ैक्ट्री में पड़ा है. जो ज़हरीला है. ऊँची झाड़ियों के बीच से हमें गोदामनुमा स्थान दिखता है. इस कमरे में प्लास्टिक की बोरियों में कुछ भरा पड़ा है. कुछ बोरियाँ जो फट गई हैं. उनसे सफ़ेद पाउडर सा कुछ बाहर बिखर गया है. शोधों के मुताबिक बारिश के कारण यह पदार्थ जो आसपास बहता है जो ज़मीन में पिछले 20 सालों से जा रहा है उसके कारण यहाँ का पानी ज़हरीला हो गया है और पीने योग्य नहीं बचा है. दुर्घटना लेकिन 1984 की वह दुर्घटना हुई कैसे?
दुर्घटना के बाद के तीन सालों की अपनी जाँच के बाद केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानी सीबीआई ने अपनी रिपोर्ट में कहा था, "डिज़ाइन की त्रुटि के कारण प्लांट का रेफ़्रीजरेशन सिस्टम ठीक तरह से काम नहीं कर पाता था." सीबीआई ने कहा "टैंक का प्रेशर हर दो घंटे में जाँचने के बजाय आठ घंटे में जाँचा जाता था. दो दिसंबर को जब टैंक 610 में प्रेशर ज़्यादा दिखा तो उसे 611 और 619 में खाली करने की गुंजाइश भी नहीं थी क्योंकि वे पहले से भरे हुए थे." प्रबंधन ने हालाँकि इन बातों से इंकार किया था. यूनियन क़ारबाईड की ओर से तो उसके एक प्रतिनिधि ने एक बार यहाँ तक कहा कि यह दुर्घटना कुछ नाराज़ और असंतुष्ट कर्मचारियों की कारस्तानी थी. दुर्दशा कारखाने के भीतर एम आई सी के प्लांट से लगी कंक्रीट की बनी पतली सड़क है. यहीं है टैंक नंबर 610, मिथाइल आइसोसाइनेट तैयार करने के लिए बनाए गए तीन टैंकों में से एक. पहले इसका ज़्यादा हिस्सा ज़मीन के भीतर था. लेकिन बाद में जाँच पड़ताल के लिए बाहर निकाल लिया गया. अब यह सड़क के किनारे पड़ा है.
सरकार ने इस पूरी फ़ैक्ट्री को अपने कब्ज़े में लिया था. तब यह भी सुना गया था कि जाँच के आधार पर कभी इस पूरे प्लांट को दुर्घटना के मामले में सबूत के दौर पर इस्तेमाल किया जाएगा. लेकिन कारखाने के पीछे और दाहिनी तरफ़ जहाँ से रेलवे लाइन गुज़रती है, दीवारें पुरानी होकर टूट गई है. जिससे बच्चे और बड़े सभी अंदर घुस जाते हैं मवेशी भी. काफ़ी कल-पूर्जे धीरे-धीरे गायब हो रहे हैं. शायद कबाड़ी बाज़ार में बेचने के लिए. हालाँकि फ़ैक्ट्री के टॉवर पर जाने की मनाही है. लेकिन थोड़ी मिन्नतों के बाद मुझे उस पर भी चढ़ने का मौक़ा मिल गया. यहाँ से पूरा शहर दिखता है. हवा का रुख़ उस दिन उत्तर से दक्षिण की ओर था. इसीलिए पूरी ज़हरीली गैस शहर की ओर ही गई और पानी की मौजूदगी वाली हर चीज से अभिक्रिया कर ज़हरीली हो गई. कारखाने में उग आए जंगल के बीचों-बीच कुछ दूर औरते लकड़ियाँ काट रही हैं और एक औरत तो मिट्टी खोदकर ले जा रही है. क्या इन्हें अंदाज़ा है कि ये सब भी ज़हरीला हो सकता है? शायद नहीं. |
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