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पाक चुनाव में अमरीका की दिलचस्पी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कहते हैं कि अमरीका में हज़ारों मील दूर बसा एक देश अगर बहस का मुद्दा बने तो या तो उस देश के साथ अमरीका के बेहद अच्छे और गहरे ताल्लुकात हैं या फिर उसे उस देश से किसी बात का डर है. पाकिस्तान में सोमवार के चुनाव का जायज़ा लेने के लिए यहाँ से बड़े बड़े सीनेटर वहां पहुंचे हुए हैं. अमरीकी दूतावास की कई टीमें वहां चक्कर लगा रही हैं, अमरीकी मीडिया में ज़ोरदार चर्चे हो रहे हैं, संसद में भी लंबे लंबे भाषण दिए गए हैं. तो पाकिस्तान के चुनावों में अमरीका को इतनी दिलचस्पी क्यों है? आख़िर क्यों? अब तक सिर्फ़ पाकिस्तानी फ़ौज के साथ रिश्ता रखने वाला अमरीका पिछले कुछ महीनों से वहाँ लोकतंत्र और जनता के हक की बात क्यों कर रहा है? हाल तक विदेश विभाग में दक्षिण एशिया पर काम करनेवाले डैनियल मार्की का कहना है कि यहां ये बात समझ में आने लगी है कि अमरीका को उस इलाक़े में सालों तक रहना पड़ सकता है. डैनियल मार्की कहते हैं कि अगर वहां सालों तक रहना है तो फिर पूरे पाकिस्तान को साथ लेना होगा, वहां की जनता को समझाना होगा कि वो भी अमरीका को एक साझेदार की तरह देखें. और जब यहाँ के रिपबलिकन सीनेटर चक हेगेल पाकिस्तान के लिए रवाना हो रहे थे तो उन्होंने भी कुछ ऐसे ही इशारे किए. उनका कहना था कि उनकी मौजूदगी से पाकिस्तानी जनता को ये संदेश ज़रूर जाएगा कि अमरीका एक ऐसा चुनाव चाहता है जिसमें कोई धांधली न हो, किसी को डराया धमकाया न जाए. कोशिश यहाँ इस बात की है कि चुनाव के परिणाम जो भी हों, जनता की नज़रों में अमरीका की एक बेहतर छवि बने और साथ ही उन्हें ये भरोसा हो कि चुनाव सही हुए हैं. अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर क्या हो सकता है? किस बात का डर है अमरीका को? अमरीका का डर अमरीका और पाकिस्तान के रिश्तों को यहाँ रहकर सालों से देख रहीं आयशा सिद्दिक़ा कहती हैं डर है पाकिस्तान के स्थायित्व को लेकर. उनका कहना है, "यहाँ ख़ौफ़ ये है कि कहीं कोई मज़हबी गुट पाकिस्तान पर हावी न हो जाए. दरअसल अमरीका को ख़ास डर है परमाणु हथियारों को लेकर." आयशा सिद्दिक़ा की बातें अमरीकी सोच का एक महत्वपूर्ण चेहरा पेश करती हैं. विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस ने पिछले हफ़्ते ही कहा है कि इस चुनाव में बहुत कुछ दाँव पर है. हाल ही में अमरीकी कांग्रेस की एक बहस में भी कहा गया कि अगर चुनाव सही नहीं हुए तो हो सकता है कि जनता सड़कों पर निकल आए, ख़ून ख़राबा हो और पूरे देश में ऐसा माहौल पैदा हो जाए जो अल-क़ायदा जैसी ताकतों के हक में हो. लेकिन इसके बावजूद अमरीका इस चुनाव में कुछ धांधली होगी ये मानकर चल रहा है. विदेश विभाग में दक्षिण एशिया मामलों के एक उच्च अधिकारी रिचर्ड बाउचर का कहना है कि अगर बहुत अच्छा और बहुत ख़राब के पैमाने पर रखा जाए तो ये चुनाव कहीं बीच में जाकर ठहरेंगे. और ये बात बाउचर चुनाव से पहले ही कह चुके हैं. तो फिर इस तरह के लोकतंत्र से क्या हासिल करने की कोशिश कर रहा है अमरीका? आय़शा सिद्दिक़ा कहती हैं, "अपनी हिफ़ाज़त" उनका कहना है कि अमरीका में पाकिस्तान के लिए एक ऐसे लोकतंत्र की चाहत है जिसमें चुनाव हो जाएँ, जो ताक़तवर राज्य हैं वो उनके हिमायतियों के हाथ में चले जाएँ, जो जनता को भी कुछ हद तक मंज़ूर हो और उनके अपने फ़ायदों के लिए भी कारगर हो. कहती हैं, "अगर उससे दाएँ-बाएँ गए तो फिर वो जम्हूरियत नहीं कहलाएगी, ये भी उसका समर्थन नहीं करेंगे और उसे दरकिनार कर देंगे." आज पाकिस्तान को लेकर अमरीकी नीति पर नज़र डालें तो ये ज़रूर लगता है कि कहीं न कहीं एक एहसास है कि एक व्यक्ति या एक संस्था के इर्द गिर्द घूमने वाली नीति लंबे समय तक काम नहीं कर सकती और पूरे देश के साथ ताल्लुकात बनाने की ज़रूरत है. लेकिन क्या अमरीका आज के पाकिस्तान में परवेज़ मुशर्रफ, फ़ौज और जनता सबको एक साथ खुश रख सकता है? आनेवाले दिनों में अमरीकी विदेश नीति की शायद यही सबसे बड़ी चुनौती होगी. |
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