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विकलांगों के लिए निजी क्षेत्र में नौकरियाँ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सार्वजनिक क्षेत्र में नौकरियों की घटती संख्या को देखते हुए केंद्र सरकार ने विकलांग लोगों के लिए निजी क्षेत्र में नौकरी संबंधी एक स्कीम को लागू करने का फ़ैसला लिया है. केंद्र सरकार की आर्थिक मामलों की कैबिनेट कमेटी ने इस स्कीम को मंज़ूरी भी दे दी है जिसके बाद प्रतिवर्ष एक लाख विकलांग लोगों को निजी क्षेत्र में नौकरियाँ मिल सकेंगी. केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी ने केंद्र सरकार की इस नई योजना को मंज़ूरी दिए जाने की जानकारी देते हुए कहा कि इसके लिए सेंट्रल सेक्टर में 1800 करोड़ रूपए का प्रावधान किया गया है. उन्होंने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्रों में विकलांगों के लिए ऐसी स्कीम पहले से ही लागू है पर अब निजी क्षेत्र में भी इसे लागू करने के लिए यह फ़ैसला लिया गया है. इस स्कीम के तहत विकलांग लोगों को अधिकतम 25 हज़ार रूपए प्रतिमाह वेतन के तौर पर दिए जाएंगे. केंद्र सरकार की ओर से इस स्कीम में सहयोग करने के लिए निजी क्षेत्र के कर्मचारियों का पीएफ़ और तीन महीने की बीमा राशि मुहैया कराई जाएगी. प्रयास पर प्रतिक्रिया लेकिन विकलांगों के अधिकारों के लिए काम कर रहे कुछ लोग सरकार के इस प्रयास को नाकाफ़ी बताते हैं.
एक्शन एड संस्था के पीके पिंचा बताते हैं, “सरकार की यह नई स्कीम नाकाफ़ी है. दरअसल, विकलांग लोग सभी वर्गों, धर्मों, जातियों, समुदायों में हैं पर राजनीतिक रूप से विकलांग अपनी कोई आवाज़ लेकर नहीं चलते इसलिए इनकी उपेक्षा की जाती रही है.” ग़ौरतलब है कि 1977 में बने एक क़ानून के तहत सार्वजनिक क्षेत्र में विकलांगों को तीन प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई थी पर यह भी केवल तीसरी और चौथी श्रेणी की नौकरियों के लिए था. इसके बाद 1995 में इसे सार्वजनिक और निजी क्षेत्र में पाँच प्रतिशत आरक्षण के तौर पर लागू किया गया और पहली, दूसरी श्रेणी की नौकरियों में भी इन्हें जगह मिलने लगी. हालांकि निजी क्षेत्र की ओर से इस दिशा में कोई पहल देखने को नहीं ही मिली पर अब सरकार के इस फ़ैसले का कुछ सुझावों के साथ उद्योग जगत स्वागत कर रहा है. भारतीय उद्योगजगत की एक महत्वपूर्ण संस्था, फ़िक्की के आर्थिक सलाहकार अंजन रॉय कहते हैं कि सरकार ने इन कर्मचारियों के लिए केवल तीन वर्ष तक बीमा राशि अपनी ओर से देने की बात की है. यह कम है और इसे कम से कम 10 साल के लिए किया जाना चाहिए था. अंजन कहते हैं कि भारत में विकलांगों की तादाद काफ़ी ज़्यादा है और केवल निजी क्षेत्र के भरोसे ही इनकी स्थिति नहीं बदल सकती, सरकार को अपनी भूमिका और बेहतर तरीके से निभानी होगी. | इससे जुड़ी ख़बरें जयपुर फ़ुट पहुँचा पाकिस्तान06 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस विकलांग चाहते हैं बराबरी का अधिकार25 जुलाई, 2007 | भारत और पड़ोस मूक-बधिरों की भाषा में भी चलता है बैंक17 जून, 2006 | भारत और पड़ोस विकलांग भी शामिल हैं दांडी यात्रा में 18 मार्च, 2005 | भारत और पड़ोस ताकि दहेज के लिए पैसै जुट सकें...23 फ़रवरी, 2004 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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