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बुधवार, 25 जुलाई, 2007 को 10:52 GMT तक के समाचार
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विकलांग चाहते हैं बराबरी का अधिकार

एक विकलांग
भारत में विकलांग लंबे समय से अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं
भारत के शारीरिक रूप से अक्षम लोग चाहते हैं कि उनके अधिकारों से जुड़े संयुक्त राष्ट्र के संधिपत्र का जल्दी अनुमोदन किया जाए.

भारत ने मार्च में शारीरिक रूप से अक्षम लोगों से जुड़े संयुक्त राष्ट्र के संधिपत्र पर हस्ताक्षर किए थे लेकिन संसद में इसका अनुमोदन किया जाना बाकी है.

इस संधिपत्र में शारीरिक रूप से अक्षम लोगों को न सिर्फ समान अधिकार देने की बात कही गई है बल्कि उन्हें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से मज़बूत करने की बात भी कही गई.

स्थिति

भारत में शारीरिक रूप से अक्षम लोगों को रोज़मर्रा की ज़िंदगी में तमाम तरह की परेशानियों से जूझना पड़ता है.

 हमारे देश ने अबतक इस संधिपत्र पर केवल हस्ताक्षर किए हैं. इसका मतलब होता है कि ऐसा करने का हमारा इरादा है. अभी तक हमने क़ानून को माना नहीं है
जावेद आबिदी, सामाजिक कार्यकर्ता

ऐसे कई उदाहरण हैं जब मानसिक बीमारी से जूझ रहे किसी व्यक्ति को हवाई जहाज पर सवार होने की अनुमति नहीं दी गई और विकलांग परीक्षार्थियों के हाथ से भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाने के मौक़े निकल गए.

समाज में शारीरिक अक्षमताओं से जूझ रहे लोगों के साथ हो रहा भेदभाव जारी है.

वैसे शारीरिक अक्षमताओं से जूझ रहे लोगों के अधिकारों की वकालत करने वाली डॉक्टर अमिता ढांडा कहती हैं कि यह संधिपत्र एक महत्वपूर्ण क़दम है.

हैदराबाद की रहने वाली डॉक्टर ढांडा कहती हैं, "इस संधिपत्र पर भारत के हस्ताक्षर करने से अब शारीरिक रूप से अक्षम लोगों को अपने सामाजिक और राजनीतिक अधिकार पाने में मदद मिलेगी."

लेकिन क्या संधिपत्र पर हस्ताक्षर करना ही काफ़ी है?

अनुमोदन

जावेद आबिदी वर्षों से शारीरिक रूप से अक्षम लोगों को समान अधिकार दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. वो चाहते हैं कि भारत ज़ल्द से ज़ल्द इस संधिपत्र का अनुमोदन करे.

आबिदी कहते हैं, "भारत ने अबतक इस संधिपत्र पर केवल हस्ताक्षर किए हैं. इसका मतलब होता है कि ऐसा करने का हमारा इरादा है. अभी तक हमने क़ानून को माना नहीं है."

वो आगे कहते हैं, "मुझे बताया गया है कि सरकार इस मुद्दे को लेकर गंभीर है और उसने इस संधिपत्र पर पहले ही दिन हस्ताक्षर कर दिए थे. तब से लेकर आज तक इतने दिन गुज़र गए लेकिन अबतक अनुमोदन नहीं किया गया. सरकार को इस संधिपत्र का अनुमोदन करने में इतने दिन क्यों लग रहे हैं?"

 इस संधिपत्र पर भारत के हस्ताक्षर करने से अब शारीरिक रूप से अक्षम लोगों को अपने सामाजिक और राजनीतिक अधिकार पाने में मदद मिलेगी
डॉ अमिता ढांडा, वकील

प्रसन्न कुमार पिंछा दृष्टिहीन हैं लेकिन इस संधिपत्र के अनुमोदन को लेकर सरकार की तरफ़ से उठाए जा रहे कदमों पर उनकी कड़ी नज़र है.

प्रसन्न का मानना है कि शारीरिक रूप से अक्षम लोगों को भी अनुमोदन प्रक्रिया का हिस्सा होना चाहिए.

वो कहते हैं, "ऐसा नहीं है कि इस संधिपत्र के आते ही विकलांगों के लिए सबकुछ अच्छा हो जाएगा. लेकिन इस संधिपत्र के अनुमोदित होने के बाद विकलांग लोग सरकार और समाज से अपने अधिकारों के लिए और ज़ोर-शोर से मांग कर सकेंगे. संधिपत्र के अनुमोदन होने के बाद सरकार को उन क़ानूनों में बदलाव लाना होगा जिनका संबंध इस संधि में दिए गए मौलिक अधिकारों और मानवाधिकारों से है."

वहीं दूसरी तरफ केंद्र सरकार का कहना है कि इस दिशा में काम हो रहा है. सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय में वरिष्ठ अधिकारी आशीष कुमार को भरोसा है कि इस संधिपत्र के अनुमोदन की प्रक्रिया जल्द पूरी होगी.

वो कहते हैं, "कोई निश्चित समय सीमा बताना संभव नहीं है क्योंकि अधिनियमों में संशोधन संसद में होता है और संशोधन की प्रक्रिया बहुत लंबी है."

शारीरिक रूप से अक्षम लोगों की समाज में अपना मुकाम हासिल करने की लड़ाई जारी है. जहाँ वो संधिपत्र पर हस्ताक्षर किए जाने से आशान्वित है वहीं संधि के अनुमोदन में देरी होने से चिंतित भी.

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