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हौसले से चलती है अब्दुल की टैक्सी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दसवीं तक पढ़ चुके 28 वर्षीय अब्दुल सत्तार मंसूरी मुंबई की सड़कों पर वैसे ही टैक्सी दौड़ाते हैं जैसे कोई और टैक्सी ड्राइवर. लेकिन वे सबसे अलग हैं, उनके पास लाइसेंस नहीं है. लेकिन हो सकता है कि और भी कई टैक्सी ड्राइवर हों जिनके पास लाइसेंस न हो. अब्दुल सत्तार के पास लाइसेंस नहीं है क्योंकि उन्हीं के शब्दों में, “मेरे दोनों हाथ-पैर में ऊंगलियां नहीं है.”. पढ़ाई के दौरान ही उन्हें घर की ज़िम्मेदारियों से रूबरू होना पड़ा और पढ़ाई छोड़कर इन्हें कुछ पैसे कमाने की जुगत के बारे में सोचना पड़ा. जब उनके पास कुछ काम नहीं था तो अपने बड़े भाई की टैक्सी को धोने का काम किया करते थे. और धीरे धीरे टैक्सी चलानी भी सीख ली. “मैंने सोचा जब तक कुछ नहीं है, यही करूं. क़ानूनन टैक्सी ड्राइवर बनने के लिए जब मैं आरटीओ ऑफिस लाइसेस बनवाने पहुँचा तो उन लोगों ने मेरे हाथ-पैर देखकर लाइसेंस नहीं दिया, यह देखते हुए भी उँगलियाँ नहीं होने के बावजूद मैं अच्छी टैक्सी चला लेता हूं”. करीब सात साल से टैक्सी चला रहे अब्दुल को इस बात का इल़्म नहीं है कि उन्हें भगवान ने ऐसा क्यों बनाया लेकिन इससे ज़्यादा ये दुख है कि यहाँ रहने वाले लोग भी इनका साथ नहीं दे रहे हैं. दस साल पहले 1997 में इन्होंने एम्प्लॉयमेंट एक्सचेंज में नौकरी के लिए आवेदन पत्र यह सोचकर भरा था कि विकलांग लोगों को सरकारी नौकरियाँ जल्दी मिल जाती हैं लेकिन आज तक उनका जवाब नहीं आया. “मैंने सोचा था कि विकलांग होने की वजह से मुझे पीसीओ खोलने का तो अधिकार मिल ही जाएगा लेकिन आज तक इंतज़ार के सिवाए मुझे कुछ नहीं मिला”. कई बार ट्रैफिक पुलिस से भी इनका सामना हुआ है. वे स्वीकार करते हैं, “बहुत बार मुझे कई ट्रैफिक वाले ने डाँट फटकार और धमकियां भी दी लेकिन ज़्यादातर लोग मेरी हिम्मत देखकर मुझपर तरस खाकर छोड़कर देते हैं”. उनकी गाड़ी में बैठने वाले लोग अक्सर उनके साथ रहमदिली से ही पेश आते हैं और अब्दुल का कहना है कि वे उनकी हालत देखकर डरते नहीं हैं. फिलहाल तो उनके बड़े भाई की गाड़ी है जो खाली रहने पर वे चलाते हैं. ये बताते हैं, “अगर भाई दिन में गाड़ी चलाता है तो मैं रात के समय निकालता हूं और अगर वह रात में चलाता है तो मैं दिन में चलाता हूं”. दुख “कभी कभी बहुत तकलीफ होती है जब कोई अपना ही मेरी खिल्ली उड़ाता है. जब कोई मुझे बेचारगी की नज़र से देखता है और मेरी हंसी उड़ाकर ये कहता है कि लो अब ये भी टैक्सी चलाएंगे तो मुझे दुख भी होता है और बहुत गुस्सा भी आता है. इसी बात को लेकर कई बार टैक्सी ड्राइवरों से मेरी झड़प भी हो जाती है”. उन्हें फ़िल्में और क्रिकेट देखने का काफ़ी शौक है. शायद ही कोई नई फ़िल्म ऐसी होगी जो उन्होंने नहीं देखी होगी. क्रिकेट में उन्हें ख़ासतौर पर भारत-पाकिस्तान का मैच देखना पसंद है. अब्दुल को इंतज़ार है अपनी सरकारी नौकरी का, किस दिन उन्हें सरकारी नौकरी मिलेगी और फिर ये अपनी मां की तमन्ना पूरी करेंगे उसकी पसंद की लड़की से शादी करके. सलाम कुछ सोचते हुए कहते हैं, “मेरा भी मन करता है कि मेरा अपना घर-परिवार हो लेकिन मैं जब तक अपना कुछ नहीं कर लेता तब तक घर नहीं बसाने की सोच भी नहीं सकता हूँ. अपने मां-बाप की तरह मैं अशिक्षित नहीं हूं. मैं पढ़ा लिखा हूं और चाहता हूं कि मेरे बच्चों को खिलाने और पढ़ाने लायक तो पैसे कमा सकूं”. | इससे जुड़ी ख़बरें कोठरी में हिम्मत की मिसाल25 अगस्त, 2006 | पहला पन्ना पर्वत से ऊँचा हौसला04 सितंबर, 2003 | पहला पन्ना हाथ नहीं, पर हौसला बुलंद30 मार्च, 2003 | पहला पन्ना विकलांग भी शामिल हैं दांडी यात्रा में 18 मार्च, 2005 | भारत और पड़ोस सिर्फ़ विकलांगों के लिए एक अस्पताल31 अगस्त, 2004 | पहला पन्ना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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