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सिर्फ़ विकलांगों के लिए एक अस्पताल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
राजनीति और बाज़ार के इस युग में अक्सर अच्छी चीज़ें भी ख़बर नहीं बन पातीं और ऐसे देश में तो ये विडंबना और भी ज़्यादा होती है जहां राजशाही हो और प्रेस की आज़ादी ना हो. सऊदी अरब के 'ह्यूमैनिटेरियन सिटी' को इसका सबसे अच्छा उदाहरण माना जा सकता है. आमतौर पर सऊदी अरब की चर्चा होती है तेल के लिए या फिर वहाँ की राजशाही के लिए या फिर चरमपंथी गतिविधियों के लिए. लेकिन पिछले दिनों मुझे सऊदी अरब जाने का मौक़ा मिला तो एक पत्रकार की तरह मैं स्वाभाविक रूप से वहाँ की राजनीति, लोगों की सोच और वहाँ हो रही घटनाओं को जानने में ज़्यादा दिलचस्पी ले रहा था. लेकिन मेरे एक मित्र के आग्रह पर मैं ह्यूमैनिटेरियन सिटी देखने गया तो बहुत शिद्दत से महसूस हुआ कि राजनीति और बाज़ार के चलते किस तरह अच्छी चीज़ों पर नज़र नहीं जाती. राजधानी रियाद से 30 किलोमीटर दूर 'सुल्तान बिन अब्दुलअज़ीज़ ह्यूर्मैनिटेरियन सिटी' यूँ तो ये आधुनिक सुख-सुविधाओं से लैस एक 400 बिस्तरों वाला अस्पताल है. लेकिन इसकी विशेषता यह है कि इसे विशेष रुप से विकलांगों और ख़ास क़िस्म की ऐसी बीमारियों के इलाज के लिए ही बनाया गया है जिससे विकलांगता का ख़तरा होता है. एक अनुमान के मुताबिक़ दुनिया भर में इस समय 25 करोड़ लोग विकलांग हैं और सऊदी अरब में यह संख्या साढ़े सात लाख से ज़्यादा है जो कुल जनसंख्या का 4 प्रतिशत से भी अधिक है. ह्यूमैनिटेरियन सिटी के निदेशक बंदर अल आरा कहना है कि आने वाले दस वर्षों में पूरे मध्यपूर्व में क़रीब ढ़ाई करोड़ लोग विकलांग होंगें और इसे देखते हुए ही इस अस्पताल का निर्माण किया गया है. खर्च बराबर फ़ीस सऊदी अरब के शहज़ादे सुल्तान बिन अब्दुल अज़ीज़ ने 1996 में 35 करोड़ डॉलर का दान देकर इस सिटी का निर्माण कराया था. यह मार्च सन 2002 में बनकर तैयार हुआ और अब वहाँ पूरे मध्यपूर्व से मरीज़ आते हैं. सिटी के निदेशक बंदर अल आरा कहना है, "यह मुनाफ़ा ना कमाने वाली एक ग़ैरसरकारी संस्था है और यहाँ मरीज़ों से कोई भारी भरकम फ़ीस नहीं ला जाती. बस सिर्फ़ इतनी कि अस्पताल का ख़र्चा चल सके और वह सब सुविधाएँ एक छत के नीचे उपलब्ध कराई जाती हैं उसके लिए मरीज़ों को दूसरी जगह ना जाना पड़े." अस्पताल में काम करने वाली एक डॉक्टर लामिया ए जात ने यहाँ मौजूद सुविधाओं की जानकारी देते हुए बताया, "यहाँ विशेष रुप से उन बुज़ुर्गों और बच्चों को चिकित्सा उपलब्ध कराई जाती है जिन्हें आम अस्पतालों में इलाज की सुविधा नहीं मिल पाती जैसे विकलांगों के लिए कृत्रिम हाथ-पैर उपलब्ध कराना, पक्षाघात या दूसरी गंभीर बीमारियों से ग्रस्त मरीज़ों के पुनर्वास का काम आदि." कृत्रिम पैरों से ओलंपिक तक अस्पताल में मेरी मुलाक़ात अंतराष्ट्रीय स्तर के एक खिलाड़ी अब्दुल्ला हसन अल फ़ीफ़ी से हुई जो बचपन में अपने दोनों पैर गंवा चुके थे.
लेकिन इस अस्पताल की मदद से वे अब बास्केट बॉल के अंतराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी बन चुके हैं और एथेंस ओलंपिक में भाग लेने के लिए एथेंस भी गए थे. अब्दुल्ला हसन अल फ़ीफ़ी ने बताया कि इस अस्पताल की और से उन्हें कृत्रिम पैरों के दो सेट दिए गए हैं जिनमें से एक सैट का इस्तेमाल वे अपने रोज़मर्रा के कामों के लिए करते हैं और दूसरे सेट का खेलने के लिए. हयुमैनिटेरियन सिटी के निदेशक का कहना है कि यह अस्पताल मध्यपूर्व के देशों के मरीज़ों के लिए खोला गया है लेकिन किसी दूसरे देश के मरीज़ का इलाज करने पर यहाँ कोई प्रतिबंध नहीं है. उनका कहना है कि अगर ज़रुरत पड़ती है तो दाखिल मरीज़ को यूरोप और अमरीका भिजवाने का इंतज़ाम भी किया जाता है. |
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