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ताकि दहेज के लिए पैसै जुट सकें... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सोफ़िया न सुन सकती है न बोल सकती है...और भारत के ग़रीब परिवार की सदस्य होने के नाते उसका भविष्य बहुत उज्जवल नहीं है. ऐसे किसी देश में जहाँ विकलांगता अपने आपमें ग़रीबी का कारण हो सकती है वहाँ सोफ़िया को काम मिलने की उम्मीद कम ही थी. और जब काम नहीं मिलता तो यह उम्मीद भी कम ही थी कि वह अपने दहेज के लिए पैसे जुटा पाती जिससे कि उसकी शादी हो जाए. लेकिन वह 16 साल की ही थी जब उसे केरल में गूंगों और बहरों के लिए खुले स्कूल में भर्ती होने का प्रस्ताव मिला. इस स्कूल में पढ़ाई के दौरान उसे काम करने का भी अवसर मिला जिससे वह कुछ पैसे कमा सके. इसी बीच उसे उसका प्रेमी विनोद मिल गया और उसने वह संस्थान छोड़ दिया. लेकिन उसे अपने संस्थान की याद इतनी सताती रही कि वह वहाँ काम करने के लिए वापस आ गई. लेकिन इस बार क्वालिटी कंट्रोल संभालने वाले के रुप में. उसका साथी विनोद भी वहीं काम करने लगा. यह संस्थान उन लड़कियों को काम देता है जो किसी न किसी रुप से विकलांग हैं और जिन्हें अपनी शादी के लिए दहेज जुटाना भी कठिन है. इस प्रोजेक्ट की शुरुआत सिस्टर माइकल फ़्रांसिस ने की थी. यह संस्था 'ग्रीन बेबी' नाम की कंपनी के लिए काम करती है जो पश्चिमी देशॉ के बच्चों के लिए 'ऑर्गेनिक' कपड़े बेचती है. सिस्टर बेस्टी कहती हैं, ''यह सामाजिक कार्य इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह लड़कियों को रोज़गार उपलब्ध कराता है और उनको बेहतर ज़िंदगी के अवसर उपलब्ध कराता है.'' उनका कहना है कि यदि यह प्रोजेक्ट नहीं होता तो उन लड़कियों को अपना सपना साकार करने का मौक़ा ही नहीं मिलता. ग्रीन बेबी की प्रवक्ता जिल बार्कर का कहना है कि इस तरह की परियोजनाएँ भारत जैसे देशों में बहुत कारगर हो सकती हैं. |
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