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लेबनान तक जा पहुँचा 'जयपुर फ़ुट' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दुनिया भर में विकलांगों का संबल बना 'जयपुर फ़ुट' लेबनान पहुँच गया है. जल्दी ही पाकिस्तान और कोलंबिया में भी विकलांग जयपुर फ़ुट के सहारे नई जिंदगी जी सकेंगे. जयपुर की महावीर विकलांग सहायता समिति ने अपने एक दल को युद्ध में पाँव गँवा चुके लोगों को जयपुर फ़ुट मुहैया कराने के लिए बेरूत भेजा है. समिति पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी शिविर लगाना चाहती है और इसके लिए पाकिस्तान सरकार से अनुमति माँगी गई है. समिति हिंसाग्रस्त इराक़ में अपाहिज हुए लोगों को जयपुर फ़ुट पर खड़ा करना चाहती है. इसके अलावा जयपुर फुट जल्दी ही कोलंबिया में भी दिखाई देगा. समिति के संस्थापक डीआर मेहता ने बीबीसी को बताया कि समिति ने कोलंबिया में अपना केंद्र शुरू करने का फ़ैसला किया है. दास्तां कोई चार दशक पहले गुलाबी नगरी के एक शिल्पी रामचंद्र शर्मा की कल्पना से इस जयपुर फ़ुट का अवतरण हुआ. वक़्त के साथ इसमें सुधार और बदलाव किए गए. मेहता कहते हैं, "यह बहुत लचीला, टिकाऊ और उपयोगी है. विकलांग इसे लगाकर ठीक से बैठ सकते हैं, जूता पहन सकते हैं और साइकिल भी चला सकते हैं. पश्चिमी देशों में विकसित कृत्रिम पैर के मुक़ाबले ये ज़्यादा बेहतर है." 'जयपुर फुट' को और बेहतर प्रयोग और अनुसंधान का काम चल रहा है. समिति, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के साथ मिलकर जयपुर फ़ुट में और सुधार कर रही है. मेहता के अनुसार, "इसरो ने जयपुर फ़ुट का नया डिजाइन तैयार किया है और बहुराष्ट्रीय रसायन कंपनी डाओ केमिकल भी इस काम में समिति की मदद कर रही है. अभी नई डिजाइन और आकार के लगभग 200 जयपुर फ़ुट का परीक्षण किया जा रहा है और प्रयोग सफल रहा तो बड़ी बात होगी." कम कीमत यूरोप और अमरीका के मुक़ाबले जयपुर फ़ुट बहुत सस्ता है. यह 30 से 35 डॉलर में उपलब्ध है, जबकि अमरीका में इसी तरह के 'फ़ुट' के कीमत आठ से दस हज़ार डॉलर आती है. पिछले साल समिति ने 19 हज़ार विकलांगों को 'जयपुर फ़ुट' आवंटित किए. वर्ष 1975 से शुरू हुआ ये सिलसिला अब तक लगभग पौने तीन लाख विकलांगों को नई जिंदगी दे चुका है. समिति अब तक अफ़ग़ानिस्तान, सूडान, नाइजीरिया, बांग्लादेश, होंडूरास और पनामा में 'जयपुर फ़ुट' पहुँचा चुकी है. अजूबा बंगाल के सुदामा राय ने एक हादसे में अपना एक पैर गँवा दिया था, लेकिन 'जयपुर फ़ुट' ने उन्हें एक बार फिर खड़ा कर दिया. अब वो समिति के लिए ही काम करते हैं. अब सुदामा दौड़ते हैं तो देखने वाले दंग रह जाते हैं. सुदामा कहते हैं, "मैं करीब डेढ़ मिनट में एक किलोमीटर दौड़ लेता हूँ. 12-14 फीट ऊँचाई से कूद सकता हूँ." अपना एक पैर गँवा चुके कृष्णा गुप्ता की भी यही कहानी है. वे समिति में जयपुर फ़ुट बनाने का काम करते हैं. अफ़गानिस्तान का अपना अनुभव बताते हुए गुप्ता ने कहा, "वहाँ दो बार जयपुर फ़ुट लगाने गया, लेकिन जंग की वजह से काम अधूरा छोड़कर लौटना पड़ा. एक बार मजारे शरीफ़ से लौटना पड़ा. वहाँ हमें जनरल दोस्तम ने बुलाया था." महाराष्ट्र के आनंद एक पैर के साथ लड़खड़ाते हुए जयपुर आए. जब जयपुर फ़ुट लगाकर खड़े हुए तो कहने लगे, " बहुत सुकून मिला, पाँवों पर खड़ा होकर देखने से दुनिया अलग ही नज़र आती है. हीनता का अहसास खत्म हो गया है." बदलते दौर की दुनिया में लोग तेजी से दौड़ रहे हैं. कोई आर्थिक तरक्की के लिए दौड़ रहा है तो कोई पापी पेट के लिए. ऐसे में जयपुर फ़ुट ने लड़खड़ाते क़दमों को संबल और सहारा दिया है ताकि वे समय की धारा में कहीं पीछे न छूट जाएँ. | इससे जुड़ी ख़बरें भारतीय रंग में विदेशियों की शादी28 जून, 2004 | भारत और पड़ोस विधवाओं ने तोड़ी वर्जनाएँ15 अक्तूबर, 2004 | भारत और पड़ोस हाथी पोलो को हरी झंडी मिली16 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस महावत को मिला हाथी की मौत का मुआवजा21 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस दुल्हनों की जोड़ी निकली लेकर घोड़ी 22 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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