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शनिवार, 17 जून, 2006 को 11:20 GMT तक के समाचार
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मूक-बधिरों की भाषा में भी चलता है बैंक

मूक बधिरों को बैंक सुविधा
इस बैंक में क़रीब 80 मूक बधिर लोगों के खाते हैं
आपने बहुत से बैंक देखे होंगे मगर इंदौर के विजय नगर क्षेत्र में बैंक ऑफ़ इंडिया की शाखा जैसा अनुभव नहीं मिला होगा.

इस बैंक में आप बड़ी तादाद में मूक-बधिर ग्राहकों को बैंक के कर्मचारियों से संवाद करते देख सकते हैं. इस बैंक के कर्मचारियों और अधिकारियों ने बाक़ायदा मूक-बधिरों की भाषा भी सीखी है.

शहर का यह बैंक एक अलग ही पहचान रखता है. इस बैंक के लगभग ढाई हज़ार ग्राहक हैं जिनमें से क़रीब 80 मूक-बधिर हैं.

बैंक के स्थापना दिवस के मौक़े पर लगभग दो वर्ष पहले मूक-बधिरों के बीच काम करने वाली एक संस्था की पहल पर उनके लिये एक प्रतियोगिता का आयोजन किया गया और तभी से इनके बारे में सोचा जाने लगा.

सबसे पहले बैंक ने चार खाते खोले और अच्छे परिणामों ने उन्हें और खाते खोलने के लिए प्रेरित किया.

सुविधाएँ

बैंक ने अपने इन विशेष ग्राहकों को कुछ सुविधाएँ भी दी है. जहाँ दूसरे ग्राहकों को खाता खोलने के लिए कम से कम 1000 रूपए देने होते हैं वही मूक-बधिर लोगों को मात्र 100 रूपए में खाताधारक बना दिया जाता है.

इसके साथ ही उन्हें एटीएम कार्ड भी दिया गया है. बैंक मैनेजर एसके चौधरी कहते है, "इस पूरी प्रक्रिया का मक़सद इन लोंगो में आत्मविश्वास पैदा करना था."

उनका कहना है कि अन्य बैंकों में मूक-बधिरों के खाता खोलने पर कोई रोक नहीं है मगर भाषा समझने में मुश्किल के कारण बैंक खाता नहीं खोलते हैं.

बैंक मैनेजर कहते है कि समाज के प्रति बैंक की भी कुछ ज़िम्मेदारी है और वे इसी ज़िम्मेदारी को निभाने की कोशिश कर रहे हैं.

 इस पूरी प्रक्रिया का मक़सद इन लोंगो में आत्मविश्वास पैदा करना था
एसके चौधरी, बैंक मैनेजर

इस प्रयास के पीछे की पूरी सोच है ज्ञानेंद्र पुरोहित की जो 'आनंद मूक बधिर संस्थान' के संचालक हैं.
पुरोहित ने अपने मूक-बधिर भाई को खोने के बाद ऐसे लोगों के बीच काम करने की ठानी.

मूक-बधिरों के लिए काम करने के लिए उन्होंने अपनी चार्टर्ड एकाउंटेंट की पढ़ाई तक छोड़ दी.

पुरोहित का कहना है कि इस काम में बैक के अधिकारियों ने भी दिलचस्पी दिखाई और मूक-बधिरों की भाषा को सीखा ताकि उन्हें आसानी से समझा जा सके.

ख़ुशी

यहाँ पर अपना खाता खोल चुके एक ऐसे ही व्यक्ति पंकज मिश्रा से जब खाते के बारे में पूछा गया तो उनकी खुशी का ठिकाना नही था.

उन्होंने फ़ौरन अपनी जेब में रखे एटीएम कार्ड को दिखाया.

प्रकाश सिऩ्हा भी अपने आप को खुशकिस्मत मानते है. अपने हाथों से इशारा करके उन्होंने बताया कि अब वो आसानी से बैंक में सब काम कर सकते हैं.

बैंक कर्मचारियों का कहना है कि शुरू में इन लोगों पर विशेष ध्यान दिया जाता था मगर अब इन्हें सामान्य लोगों की तरह ही माना जाता है.

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