BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
बुधवार, 25 जनवरी, 2006 को 10:27 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
संघर्ष की एक मिसाल हैं नीता

नीता पटेल
नीता मानती हैं कि ऐसी ज़िंदगी कठिन तो है लेकिन मज़े के साथ काटी जा सकती है
कोई ज़िंदगी की कठिनाइयों से किस तरह लड़ सकता है और किस तरह दूसरों के लिए एक मिसाल बन सकता है इस ज़िंदादिली की एक मिसाल हैं 21 वर्षीय नीता पटेल.

2001 के भीषण भूकंप में इस लड़की ने अपने दोनों पैर गवाँ दिए थे पर आज ऐसा कोई भी काम नहीं है जो वह ख़ुद नहीं कर सकतीं.

भूकंप के एकदम बाद कच्छ के अंजार में रहने वाली नीता के माता-पिता ने उसके ज़िंदा होने की उम्मीदें छोड़ दी थीं. वो बच तो गईं लेकिन जीवन पहले जैसा नहीं रहा.

नीता बताती हैं, "जब भूकंप आया तो मैं अपनी छह सहेलियों के साथ स्कूल जा रही थी. धरती के हिलते ही हम पास की एक बिल्डिंग में घुस गए पर वो भी गिर गई और मैं दब गई."

वे याद करती हैं, "मेरी दो सहेलियाँ तो नहीं बचीं. लेकिन मैं बच गई. कुछ देर बाद मुझे निकाला गया और फ़ौज के कैंप में भेजा गया जहाँ से मुझे मुंबई ले जाया गया. लेकिन मेरे दोनों पैर बेकार हो गए थे."

पैर के जाने से भी बड़ा झटका नीता को तब लगा था जब उसके मंगेतर ने उससे अपनी सगाई तोड़ दी.

नीता का कहना है, "मैं इतनी हताश हुई थी कि मैंने दो बार खुदकुशी करने की भी कोशिश की. मेरा तो भगवान पर से भी विश्वास उठ गया था. अकेले जीवन काटना बहुत कठिन लगता था. तब ऐसा ख़्याल आया कि कुछ ऐसा क्यों न करुँ कि उस शख़्स को मुझसे सगाई तोड़ने का अफ़सोस हो."

प्रेरणा

इस दौरान नीता ने मुंबई में विकलांग लोगों के खेल का एक कार्यक्रम देखा और पाया कि उनके जैसे और भी लोग हैं और वे इतना बढ़िया खेलते भी हैं.

इसमें मानसिक रूप से विकलांग भी थे. फिर क्या था नीता ने पहले तो व्हीलचेयर की ज़िंदगी जीना सीखा. यानी अब वो ख़ुद का सारा काम कर सकती थीं.

उनका कहना है कि इस दौरान यह भी समझ में आया कि कुछ करना है तो पैसा भी चाहिए.

इसलिए पहले तो एक कटलरी की दुकान खोली जो धीरे-धीरे बड़ी हो गई है.

उनका कहना है, "पहले मेरी दुकान में छोटे-छोटे सामान थे पर अब बड़ी चीज़ें भी मिलती हैं."

वे बताती हैं, "इसके बाद कुछ पैसा इकट्ठा होने पर मैंने एक एसटीडी-पीसीओ टेलीफोन बूथ भी खोल दिया."

आत्मनिर्भर

आज नीता किसी पर भी निर्भर नहीं हैं. पिछले वर्ष बंगलौर में विकलांगों के लिए आयोजित राष्ट्रीय खेलों में उन्होंने दो पदक हासिल किए हैं.

 मेरे जैसे पीड़ित लोगों के लिए मैं इतना ही कहूँगी कि ज़िंदगी मुश्किल तो है पर अगर हम मज़बूत हैं तो इसे मज़े के साथ काट सकते हैं
नीता पटेल

साथ ही उनका समाज से जुड़ी समस्याओं की तरफ भी ध्यान गया और उन्होंने मुंबई में आयोजित वर्ल्ड सोशल फोरम में भी भाग लिया.

इसके अलावा नीता ने दो पुस्तकें भी लिखी हैं और तीसरी कृति 'संजीवनी’ के नाम से वो अगले वर्ष प्रकाशित कराना चाहती हैं.

अहमदाबाद में सिविल अस्पताल में इलाज के लिए आई नीता से पूछा कि उनका हाल ही में देश के उत्तर भाग और पाकिस्तान में आई भूकंप पीड़ितों के लिए क्या संदेश है तो वे बोलीं "मेरे जैसे पीड़ित लोगों के लिए मैं इतना ही कहूँगी कि ज़िंदगी मुश्किल तो है पर अगर हम मज़बूत हैं तो इसे मज़े के साथ काट सकते हैं."

नीता ने कहा, "व्हीलचेयर की ज़िंदगी कठिन तो है पर आदत डालने पर दुर्गम नहीं है."

इससे जुड़ी ख़बरें
ताकि दहेज के लिए पैसै जुट सकें...
23 फ़रवरी, 2004 | भारत और पड़ोस
पर्वत से ऊँचा हौसला
04 सितंबर, 2003 | पहला पन्ना
हाथ नहीं, पर हौसला बुलंद
30 मार्च, 2003 | पहला पन्ना
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>