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शुक्रवार, 11 जनवरी, 2008 को 16:22 GMT तक के समाचार
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व्यापार और सीमा विवाद पर होगी बात

मनमोहन सिंह और हू जिंताओ
अपनी चीन यात्रा में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कई मुद्दो पर सहमति बनाने का प्रयास करेंगें.
अर्थशास्त्री से प्रधानमंत्री बने डॉ मनमोहन सिंह की पहली चीन यात्रा हो और व्यापार का मुद्दा ना उठे ऐसा संभव नहीं है.

अपने कार्यकाल के दौरान पहली चीन यात्रा में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ वाणिज्य मंत्री कमलनाथ समेत भारी भरकम व्यापार प्रतिनिधिमंडल भी जा रहा है.

प्रधानमंत्री 13-14 जनवरी को चीन यात्रा पर होंगें. भारत की चिंता ये है कि उसका व्यापार चीन के साथ तेज़ी से बढ़ रहा है. पिछले साल ये सैंतीस अरब डॉलर तक पहुँच गया.

आप सोच रहे होंगें फिर चिंता क्यों? चिंता इसलिए क्योंकि भारत से चीन को बहुत कम वस्तुओं का निर्यात होता है जो चीन से भारत को होने वाले निर्यात की तुलना में बेहद कम है.

भारत के विदेश सचिव शिवशंकर मेनन का कहना है, "हम चीन को ज़्यादा चीज़े बेचना चाहतें हैं. दोनो सरकारो के सहयोग से बना स्टडी ग्रुप की रिपोर्ट संकेत देती है कि किन क्षेत्रो में व्यापार बढ़ाने की ज़रूरत है."

शिवशंकर मेनन के अनुसार व्यापार संतुलन फ़िलहाल चीन की ओर झुका हुआ है और ऐसे में हमें नए उत्पादों का चीन को निर्यात बढ़ाना है. अपनी यात्रा में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस विषय पर चर्चा करेंगें.

अन्य प्रमुख मुद्दे

व्यापार के अलावा चीन के साथ सीमा विवाद सुलझाना भी एजेंडे पर है. इस संबंध में दोनो देशो के प्रतिनिधियो के बीच पहले ही कईं दौर की वार्ता हो चुकी है.

इस यात्रा के दौरान पर्यटन, प्रतिरक्षा, जल संसाधन के इस्तेमाल सहित कई अन्य क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दो पर विचार विमर्श होने की भी संभावना है.

वैसे अगर प्रधानमंत्री का ये दौरा ऐसे समय में होता जब भारत-अमरीका के बीच असैनिक परमाणु समझौता होने के कगार पर होता तो न्यूकिलियर्स सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी) में चीन के रूख़ पर भी भारत की नज़र होती.

विदेश सचिव शिवशंकर मेनन का कहना है कि अभी ऐसी स्थिति नही आई है.

मेनन कहतें हैं, “जब एनएसजी तक बात आएगी तब ज़रूर हम अपने उन सभी दोस्तो के पास जाएँगे जो बिना शर्त भारत-अमरीका परमाणु समझौते को समर्थन देते हों.

शिवशंकर मेनन के मुताबिक़ आणविक ऊर्जा के क्षेत्र में चीन के साथ भारत पहले भी काम कर चुका है और आगे भी करने की आशा रखते है.

भारत और चीन एशिया महाद्वीप के दो बड़े देश है और दोनो जानते है कि क्षेत्रीय और स्तर पर पारस्परिक समन्वय अंतरराष्ट्रीय पटल पर उनकी आवाज़ मज़बूत करेगा.

इसीलिए दोनो देश सीमा विवाद जैसे मुद्दों को अपने रिश्तों पर हावी नहीं होने देना चाहते.

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