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बुधवार, 19 दिसंबर, 2007 को 15:45 GMT तक के समाचार
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नवाज़ लीग के चुनावी कैम्प से...

हम्ज़ा शहबाज़
शरीफ़ ख़ानदान के सिर्फ़ एक मात्र उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं
पाकिस्तान के चुनावी अखाड़े में मियाँ नवाज़ शरीफ़ और शहबाज़ शरीफ़ को अयोग्य क़रार दिए जाने के बाद हम्ज़ा शहबाज़ इस ख़ानदान के अकेले ऐसे सदस्य हैं जो चुनावी मैदान में अपनी क़िस्मत आज़मा रहे हैं.

हम्ज़ा शहबाज़ मियाँ शहबाज़ शरीफ़ के पुत्र हैं और मियाँ नवाज़ शरीफ़ के भतीजे.

हम्ज़ा शहबाज़ पर ऐसे समय पाकिस्तान में शरीफ़ ख़ानदान के कारोबारी मामले संभालने की ज़िम्मेदारी थी जब शरीफ़ ख़ानदान को सऊदी अरब भेज दिया गया था.

अब पहली बार उन्हें चुनावी राजनीति के मैदान में उतारा जा रहा है और वह लाहौर से अपनी चुनावी क़िस्मत आज़मा रहे हैं.

अगर उन्हें राजनीति की इस पहली सीढ़ी में सफलता मिलती है तो संसद में प्रतिनिधित्व करने वाले शरीफ़ ख़ानदान के वह एकमात्र सदस्य होंगे.

हम्ज़ा शहबाज़ और शहबाज़ शरीफ़ की राजनीतिक सरगर्मियों का केंद्र लाहौर में शरीफ़ ख़ानदान का मॉडल टाउन वाला आवास है.

ये वही जगह है जिस पर शरीफ़ ख़ानदान को सऊदी अरब भेजे जाने के बाद परवेज़ मुशर्रफ़ सरकार ने क़ब्ज़ा करके उसे बुज़ुर्गों के लिए पनाहगाह बना दिया था और उसका नाम रख दिया था -ओल्ड पीपुल्ज़ होम.

आठ साल बाद जब शरीफ़ ख़ानदान जब वापिस लौटा तो इस आवासीय परिसर में एक बार फिर राजनीतिक सरगर्मियाँ नज़र आने लगी हैं और हर तरफ़ मुस्लिम लीग (नवाज़) के झंडे, बैनर और पोस्टर नज़र आ रहे हैं.

मंगलवार को सुबह जब हम मियाँ शहबाज़ शरीफ़ से मुलाक़ात के लिए पहुँचे तो वहाँ पार्टी कार्यकर्ताओं की कोई बहुत बड़ी संख्या नज़र नहीं आई. बताया गया कि ज़्यादातर लोग चुनावी क्षेत्रों में अपने-अपने काम से लगे हुए हैं.

सफ़ेद कलफ़ वाली शलवार-क़मीज़ पर काले रंग का स्वेटर पहने हम्ज़ा शहबाज़ ज़्यादातर अपने मोबाइल फ़ोन पर इधर से उधर बात करते नज़र आए.

फिर शहबाज़ शरीफ़ तशरीफ़ लाए. वहाँ आए हुए लोगों से वह इज़्ज़त से मिले लेकिन उनके मिलने-जुलने में वो गर्मजोशी या लोगों के साथ वो मेल-जोल नज़र नहीं आया जो आमतौर पर वोट मांगने वालों का होता है.

शहबाज़ का स्टाइल

शहबाज़ शरीफ़ के निजी स्टाइल के बारे में लाहौर के लोगों में आम राय ये है कि कि वह एक राजनीतिक प्रतिनिधित से ज़्यादा एक बेहतर एडमिनिस्ट्रेटर या ब्यूरोक्रेट लगते हैं.

शायद यही वजह है कि उनकी पार्टी में सारी लोकप्रिय अपील मियाँ नवाज़ शरीफ़ की है जबकि शहबाज़ शरीफ़ पार्टी के प्रशासनिक मामलों और जोड़-तोड़ में ज़्यादा कारामद समझे जाते हैं.

शहबाज़ शरीफ़
शहबाज़ को राजनीतिक जोड़-तोड़ में माहिर समझा जाता है

हमारे सामने जो कुछ कार्यकर्ता शहबाज़ शरीफ़ से मिलने आते गए वो उनसे संक्षिप्त बात करते और चंद मिनटों के अंदर उन्हें झटपट फ़ारिग़ करते चले गए.

शहबाज़ शरीफ़ बीच-बीच में अपने कर्मचारियों को डाँट-डपट भी करते रहे कि मेहमानों के लिए चाय-बिस्कुट जल्दी-जल्दी क्यों नहीं पेश किए जा रहे हैं.

फिर ऐलान हुआ के मियाँ साहब लाहौर से बाहर किसी जगह चुनावी जलसे को संबोधित करने के लिए निकलने वाले हैं और गाड़ियाँ लगवाई जाएँ.

बीबीसी के साथ शहबाज़ शरीफ़ के इंटरव्यू के लिए तय पाया कि क्यों ना मैं उनके साथ गाड़ी में सवार हो जाऊँ और रास्ते में बात कर ली जाए. सो, मैं उनकी सफ़ेद रंग की बुलेट प्रूफ़ लैंड क्रूज़ में उनके साथ सवार हो गया.

रास्ते में हमने कई विषयों-मुद्दों पर बातचीत की - कुछ ऑन रिकॉर्ड और कुछ ऑफ़ द रिकॉर्ड. शहबाज़ शरीफ़ से बातचीत का लब्बोलुबाब ये निकला के उनकी पार्टी इन चुनावों में बहुमत या कुर्सी के लिए हिस्सा नहीं ले रही है बल्कि न्यायालयों की बहाली और आज़ादी के मुद्दे पर चुनाव में जा रही है.

शहबाज़ शरीफ़ आठ जनवरी के चुनावों को क़ाफ़ लीग (मुस्लिम लीग-क़ाफ़) को जिताने के लिए ढोंग और ड्रामा क़रार देते हैं.

उनकी पार्टी की नज़रें दरअसल इसके बाद वाले चुनावों पर है. नवाज़ लीग के नेताओं का ख़याल है कि जोड़-तोड़ के नतीजे में आने वाली नई सरकार कमज़ोर होगी और ज़्यादा अरसे नहीं चलेगी.

वो समझते हैं कि इन चुनावों में परवेड़ मुशर्रफ़ की सरकार नवाज़ लीग की हैसियत कम से कम रखने की कोशिश करेगी जबकि उन्हें अपना पूरा ज़ोर तमामतर सरकारी कोशिशों के बावजूद ख़ुद को एक ताक़त के तौर पर मनवाना है.

मियाँ शहबाज़ शरीफ़ के साथ गुज़ारे इस समय के दौरान वो मुझे कुछ बेचैन से नज़र आए. बड़े अरसे बाद फिर से राजनीतिक रैलियों में तक़रीरें करके उनका गला बैठा हुआ ता और थकावट भी नज़र आ रही थी.

चेहरे पर ऐसे भाव जैसे कि दिमाग़ में एक ही समय में बहुत सारे विचार एक साथ चल रहे हों और हो भी क्यों ना क्योंकि उनके पास वक़्त बहुत कम है और मुक़ाबला सख़्त.

इन चंद हफ़्तों की छोटी सी अवधि के दौरान उन्हें पार्टी छोड़कर जाने वाले कार्यकर्ताओं की वापसी और अपने समर्थकों को दोबारा इकट्ठा करना है. चुनावों में पार्टियाँ बदलने वाले ढेर सारे उम्मीदवारों से निपटना भी है.

अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए मीडिया को संभालना है, और सबसे बढ़कर ये के चुनावी धांधलियों के अंदेशों के बीच विरोधियों के मुक़ाबले के लिए अपनी लगातार रणनीति की भी निगरानी करनी है.

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