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विदेशी बाज़ार पर अफ़गानी नज़र | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
"दुनिया के लोगों से मैं बस यही चाहता हूँ कि वे मुझे मछली नहीं दें बल्कि मछली पालना बताएँ." लंबी दाढ़ी वाले 80 वर्षीय अफ़ग़ान व्यापारी ख़ाल मोहम्मद जब ये कहते हैं तो लगने लगता है कि काबुलीवालों के देश में चीज़ें बदल रही हैं. भारतीय राजधानी दिल्ली में आयोजित अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में अफ़ग़ानिस्तान से हिस्सा लेने आए 40 व्यापारियों में ख़ाल मोहम्मद सबसे बुजुर्ग थे. ख़ाल मोहम्मद अफ़गानी कालीन उद्योग के जाने-पहचाने नाम हैं. देश में लंबे समय से चल रही लड़ाई के बीच पिछले तीन दशकों से वे कारोबार में जमे हुए हैं. वे गर्व से कहते हैं, " भीषण लड़ाई के दौरान मैंने कुछ कम कालीन बेचे लेकिन मैंने कभी अफ़ग़ानिस्तान को नहीं छोड़ा." ख़ाल बताते हैं, " पूरी दुनिया जानती है कि अपने देश में, अपने लोगों के बीच मैंने ख़ुद को स्थापित किया है." देश के व्यापार को बढ़ावा देने के लिए इस उम्र में अब वे दूसरे देशों में घूमने का मन बना रहे हैं. ख़ाल कहते हैं, " मैं चाहता हूं कि पूरी दुनिया अफ़गानी कालीन को देखे और ये भी देखे कि हम कितनी दक्षता से काम करते हैं. इससे व्यापार की संभावनाएँ पैदा होंगी." ख़ाल मोहम्मद अपने देश में इस कारोबार के महत्व को सामने लाते हैं, "हर कालीन की बिक्री पर एक अफ़ग़ानी परिवार ज़िंदा रहता है." सिल्क रूट की यादें सैकड़ों साल पहले अफ़ग़ानिस्तान उस कारोबारी रास्ते का हिस्सा था जिससे पश्चिमी देशों को कीमती सामानों की आपूर्ति की जाती थी.
छोटे कारोबारों के लिए अब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार तैयार कर पाना मुश्किलों भरा है. देश में कोई बंदरगाह न होना भी इसमें बाधक है. कालीन के बुनकर मोहम्मद नबी सैफ़ी कहते हैं, "अफ़ग़ानिस्तान में हर महीने क़रीब डेढ़ लाख कालीन तैयार होते हैं लेकिन इसे 'मेड इन पाकिस्तान' के नाम से बेचना पड़ता है." सैफ़ी बताते हैं कि कालीनों की कटाई और धुलाई पाकिस्तान में की जाती है क्योंकि अफ़गानिस्तान में वो मशीनें नहीं हैं और "ब्रांड इमेज" में हम पीछे रह जाते हैं. सूखे मेवे के व्यापारी ज़हीर भी कहते हैं कि कुछ कारणों से अफ़गानी व्यापारी पीछे रह जाते हैं. वे कहते हैं, "अफ़गानिस्तान के सूखे मेवों के स्वाद और उसकी गुणवत्ता का कोई मुक़ाबला नहीं है क्योंकि हम किसी रसायन का इस्तेमाल नहीं करते." ज़हीर बताते हैं, " लेकिन चीन, ईरान और तुर्की जैसे कई देश हमारे प्रतिद्वंद्वी हैं. वे अपने उत्पादों को बिना ख़राब हुए निर्यात करने में सक्षम हैं जो सुविधा हमारे पास नहीं है." नए आयाम अफ़ग़ानिस्तान के कारोबारी अब दुनिया भर में लगने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेलों को नए अवसरों की तलाश के बेहतरीन मौक़े के तौर पर देख रहे हैं. दिल्ली के मेले में अफ़गानी स्टॉल पर आकर्षक खरबूज, सिंदूरी लाल अनार से लेकर अनोखे गहरे रंग के रत्न और हाथ से कढ़े गए सामान तक सामान शामिल थे.
काबुल हाउस कंपनी के ज़हीर अहमद बताते हैं कि मेले में आए लोग अफ़गानी संस्कृति देखकर मुग्ध नज़र आ रहे थे. वे कहते हैं, "लोग ग्रामीण अफ़गानी लोगों के परिधान को देखकर चकित थे. कभी-कभी तो वे आश्चर्य करते थे कि कोई इतना भारी कपड़ा कैसे पहन सकता है." ज़हीर बताते हैं कि ऐसे परिधान ज़्यादातर 10-12 किलोग्राम वजन के होते हैं. ज़हीर कहते हैं, " हमने उन्हें बताया कि अफ़गानी लोग कितने मज़बूत और शक्तिशाली होते हैं." पीछे नहीं महिलाएँ काबुल की सड़कों पर ब्यूटी पार्लर एक नया रुझान है लेकिन यहाँ मिलने वाली सेवाओं और उत्पादों का असर हर किसी पर नज़र नहीं आता. अफ़ग़ानिस्तान ब्यूटीशियन्स और हैंडीक्राफ़्टस यूनियन की निदेशक बिलक़ीस बशर दोस्त कहती हैं, " काबुल में लोग सजने-सँवरने के आदी हैं."
बशर बताती हैं, " लेकिन अब वे सजने के मौज़ूदा अरबी तरीक़ों जैसे चलन की नक़ल कर रहे हैं. इसमें मेक-अप का बहुत उपयोग होता है." वे बताती हैं कि अफ़ग़ान महिलाएँ सूची में अरबी महिलाओं के श्रृंगार को देखती हैं और वैसा ही दिखना चाहती हैं. अफ़ग़ानिस्तान के पार्लरों में काम करने वाली महिलाएँ हर महीने बख्शीश को छोड़ दें तो भी 400 अमरीकी डॉलर कमा सकती हैं. ब्यूटी पार्लर में महिलाओं को होने वाली यह आय देश के किसी सरकारी कर्मचारी के वेतन से दस गुना ज़्यादा है. कमाई के बावज़ूद वहाँ की महिलाओं पर कई तरह की पाबंदियाँ हैं. मसलन, कोई महिला शायद ही आपको अकेले घूमती दिखे. एक विधवा कालीन बुनकर फौज़िया हाशिमा कहती हैं, " ज़्यादातर परिवार महिलाओं को घर से बाहर जाने और बाहर काम करने की अनुमति नहीं देते." हाशिमा कहती हैं कि इन पाबंदियों को देखते हुए कालीन बुनना बेहतर विकल्प है क्योंकि इससे घर बैठे कमाया जा सकता है. अपने परिवार की अकेली कमाऊ सदस्त हाशिमा के ऊपर पाँच बच्चों की ज़िम्मेदारी है. अपने सामान को बेचने के लिए उन्हें बाहर भी जाना पड़ता है. वे कहती हैं, "बगड़म में मेरे सामान की बड़ी माँग है लेकिन एक औरत होने के नाते मेरे लिए वहाँ जाना मुश्किल होता हैं." हाशिमा बताती हैं, "अकेले सफ़र करने को लेकर मुझसे सवाल किए जाते हैं. कभी-कभी तो चेतावनी भी मिलती हैं." मुस्कुराते हुए हाशिमा कहती हैं, "ज़िंदगी एक अनवरत चुनौती है. या तो आप जीतते हैं या हारते हैं." | इससे जुड़ी ख़बरें आतंकवाद और व्यापार पर घोषणा संभव04 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस अफ़गान हेरोईन का यूरोप में फैलाव23 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस भारतीय निर्यात सौ अरब डॉलर से ज़्यादा07 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस बंजारों की एक लड़की परवीन20 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस लोकतंत्र का अफ़ग़ानिस्तानी मॉडल18 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस परदे में छिपा चेहरा, गले में अटकी आवाज़16 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस तस्करों के पेट पर लात का ख़तरा07 जनवरी, 2004 | भारत और पड़ोस दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र पर प्रगति02 जनवरी, 2004 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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