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तस्करों के पेट पर लात का ख़तरा
पाकिस्तान में भारतीय सामानों की धूम है
पाकिस्तान में भारतीय सामानों की धूम है

लाहौर के मशहूर अनारकली बाज़ार की पान गली में एक सर्द दोपहर..

कुछ लोग यहाँ सिर पर लगाने वाला तेल, चेहरे की क्रीम और पान के पत्ते ख़रीदते मिलते हैं.

बाज़ार पाकिस्तान का है मगर जो भी कुछ मिल रहा है यहाँ वह सब आया है भारत से और वह भी तस्करी के ज़रिए.

यहाँ के एक दुक़ानदार हसन कहते हैं, "भारत के बने मसाले, सुपारी, पान के पत्ते और सौंदर्य प्रसाधन यहाँ काफ़ी लोकप्रिय हैं."

मगर सार्क देशों के बीच मुक्त व्यापार के लिए हुए समझौते के बाद भारत से तस्करी का धंधा समाप्त हो जाएगा.

भारत से यहाँ ऑटोमोबाइल के पुर्ज़े, दवाएँ और आभूषण भी आते हैं.

क़ीमतें गिरेंगी


 अगर तस्करी रुकती है और व्यापार क़ानूनी तरीक़े से होता है तो निश्चित तौर पर क़ीमतें नीचे आएँगी

हसन

हसन ने बताया कि साफ़्टा समझौते के बाद ना केवल भारत बल्कि दुबई और अफ़ग़ानिस्तान से भी तस्करी पर रोक लगाने में मदद मिलेगी.

भारत से तस्करी के सामान राजस्थान और सिंध की सीमा के रास्ते खच्चरों और ऊँटों पर लादकर पाकिस्तान पहुँचते हैं.

हसन ने कहा, "अगर तस्करी रुकती है और व्यापार क़ानूनी तरीक़े से होता है तो निश्चित तौर पर क़ीमतें नीचे आएँगी."

साफ़्टा समझौते के तहत सार्क के सातों सदस्य देश सीमा कर को पाँच प्रतिशत या उससे भी नीचे लेकर आएँगे.

लाहौर में व्यापारियों के संगठन के अध्यक्ष अरशद भट्टी का मानना है कि इससे व्यापारियों को बहुत ज़्यादा फ़ायदा होगा.

उन्होंने कहा ,"मुक्त व्यापार से क़ीमतें नीचे आएँगी और माँग बढ़ेगी. अभी यहाँ मंदी है."

आशंका

लेकिन मुक्त व्यापार की चर्चा से कुछ पाकिस्तानी व्यापारियों के मन में आशंका भी घर कर गई है.

इन्हें लगता है कि फ़ैशन आदि के मामले में भारत काफ़ी आगे निकल गया है और मुक्त व्यापार से उन्हें नुक़सान ही होगा.

अरशद भट्टी ने कहा, "भारत के मुक़ाबले हमारे उद्योग काफ़ी पीछे पड़ गए हैं और हम अब प्रतियोगिता में कहीं नहीं हैं."

सपना


 भारत के मुक़ाबले हमारे उद्योग काफ़ी पीछे पड़ गए हैं और हम अब प्रतियोगिता में कहीं नहीं हैं

अरशद भट्टी

पाकिस्तानी व्यापारी कहते हैं कि उनके देश की सरकार पर विश्व बैंक और अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाओं का दबाव है जिसके कारण उन्हें सरकार से कोई मदद नहीं मिलती.

लाहौर चैंबर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के पूर्व अध्यक्ष परवेज़ हनीफ़ कहते हैं, "क्षेत्र में हमारी बिजली की दरें सबसे ज़्यादा हैं, ब्याज़ दरें सबसे ऊपर हैं और हमारे यहाँ मज़दूरी भी अच्छी नहीं है."

मगर आलोचकों का कहना है कि साफ़्टा समझौते के तहत कुछ 'संवेदनशील' चीज़ों को मुक्त व्यापार से अलग रखा गया है जिससे व्यापारियों को फ़ायदा भी होगा.

आर्थिक जानकार फ़रहान बुख़ारी कहते हैं, "ये सूची इतनी लंबी हो सकती है कि मुझे नहीं लगता किसी को इससे नुक़सान होगा."

उधर इन सारी उम्मीदों और आशंकाओं के बीच अनारकली बाज़ार में राशिद अपनी दुक़ान पर आए एक ग्राहक को कपड़े दिखाते हुए अपने सपने बुन रहे हैं.

राशिद कहते हैं, "मैं उस दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ जब मैं बिना किसी रोक-टोक के दिल्ली जा पाऊँगा और कपड़े बेच भी सकूँगा और वहाँ से डिज़ाइन भी ला सकूँगा."

राशिद का मानना है कि दोनों देशों में इतनी क़ाबलियत है कि दोनों मिलकर कामयाबी के नए मुक़ाम हासिल कर सकते हैं.

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