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मंगलवार, 06 जनवरी, 2004 को 17:18 GMT तक के समाचार
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मुक्त व्यापार की चुनौतियाँ
बांग्लादेश में अनाज इकट्ठा करती महिलाएँ
सार्क देशों में आपसी व्यापार अभी काफ़ी कम है

दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन सार्क के सात देशों के बीच मुक्त व्यापार के लिए हुआ समझौता 'साफ्टा' निश्चित तौर पर इस पूरे क्षेत्र के लिए एक अच्छी ख़बर है.

इस क्षेत्र की दो महत्वपूर्ण आर्थिक शक्तियों, भारत और पाकिस्तान, के बीच का तनाव क्षेत्र की आर्थिक समृद्धि की राह में रोड़े अटकाता रहा है.

अब सभी सदस्य देश क्षेत्र की आर्थिक प्रगति के लिए अपने-अपने बाज़ार खोलने के लिए सहमत हो गए हैं.

मगर सार्क नेताओं ने आर्थिक वृद्धि का जो ख़ाका तैयार किया है उसे अमली जामा पहनाने के लिए काफ़ी कुछ किए जाने की ज़रूरत है.

लंदन में स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक में मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया मामलों की देखरेख करने वाली अर्थशास्त्री जिल जेम्स का कहना है, "ये एक अच्छी शुरूआत अवश्य है मगर मुक्त व्यापार क्षेत्र को हासिल करना एक बड़ी चुनौती है."

मज़दूरी का अंतर

 सार्क देशों के कुल व्यापार का बस पाँच प्रतिशत हिस्सा ऐसा है जहाँ इनमें आपसी व्यापार होता है

जिल जेम्स, अर्थशास्त्री

मुक्त व्यापार को लेकर सबसे बड़ी चिंता है भारत जैसे बड़े देशों को जिन्हें लगता है कि बाज़ार खुलने से सार्क के ग़रीब देश अपने सस्ते सामान लेकर उनके बाज़ारों में ना चले आएँ.

ग़रीब देशों में मज़दूरी की नीची दर के कारण सामानों की क़ीमतें भी कम होती हैं.

ऐसी हालत में सार्क देशों के बीच मुक्त व्यापार का भविष्य काफ़ी कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि भारत का रवैया क्या रहता है.

आपसी व्यापार

एक मुश्किल ये है कि सार्क देश आपस में बहुत ज़्यादा व्यापार नहीं करते.

कपड़े, चाय, चीनी जैसे कई ऐसे उत्पाद हैं जिनका अधिकतर सदस्य देश निर्यात करते हैं.

जिल जेम्स का कहना है कि सार्क देशों के कुल व्यापार का बस पाँच प्रतिशत हिस्सा ऐसा है जहाँ इनमें आपसी व्यापार होता है.

किसी अन्य संगठन की तुलना में ये कुछ भी नहीं है.

मिसाल के तौर पर यूरोपीय संघ के देशों के कुल व्यापार का 60 प्रतिशत हिस्सा ऐसा है जहाँ आपसी व्यापार होता है.

अभी स्थति ये है कि अमरीका और श्रीलंका जैसे सार्क के बड़े देश आपस में व्यापार की जगह अमरीका से व्यापार करना ज़्यादा पसंद करते हैं.

योजना

सार्क देशों की योजना है कि करों में कटौती करके और अलग-अलग देशों के अलग-अलग उद्योगों पर विशेष ध्यान देकर समस्या का कोई हल निकाला जाए.

सार्क देशों में राजनीतिक परंपरा भी संकट खड़े करती रही है.

अक्सर ऐसा होता है कि भारत जैसे देशों में सरकारी संगठनों की बिक्री की बात उठी नहीं कि विरोध शुरू हो जाता है.

लेकिन अपने उद्योगों को संरक्षण देने की परंपरा अब नरम पड़ती जा रही है और सार्क देशों ने 1990 के दशक के प्रारंभ से इन करों में कटौती के लिए साझा प्रयास किए हैं.

प्रेरणा

सार्क देशों को मुक्त व्यापार के लिए आगे क़दम बढ़ाने की प्रेरणा अपने आस-पास के देशों के बीच इस तरह की बढ़ती दोस्ती से भी मिल रही है.

मसलन दक्षिण पूर्व एशियाई देशों का संगठन आसियान, चीन और जापान के साथ मिलकर दुनिया का सबसे बड़ा मुक्त व्यापार क्षेत्र बनाने में जुटा हुआ है.

जिल जेम्स कहती हैं कि भारत और चीन ने लगभग पाँच साल पहले मुक्त व्यापार के लिए समझौता किया था और उनका आपसी व्यापार इस दौरान सात गुना बढ़ा है.

भारत और श्रीलंका के बीच दो साल पहले व्यापार समझौता हुआ था और इसके बाद से ये व्यापार डेढ़ गुना बढ़ा है.

कहा जा सकता है कि सार्क देशों ने ऐसे समय ये समझौता किया है जब इस क्षेत्र की ज़्यादातर अर्थव्यवस्थाएँ मज़बूत होती जा रही हैं और ऐसे में क्षेत्र की बढ़ती आर्थिक ताक़त से सार्क देशों को फ़ायदा हो सकता है.

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