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सोमवार, 26 नवंबर, 2007 को 09:56 GMT तक के समाचार
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विधवा से भी बदतर है ज़िंदगी

लापता लोगों की विधवाएँ
विधवाओं का जीवन गुज़ार रही इन महिलाओं में से अधिकांश ग़रीब हैं
ज़ैनब के शौहर को भारतीय सेना ने क़रीब दस बरस पहले कथित तौर पर हिरासत में लिया था और तब से ही वो लापता हैं. हर पल टूटती आस के बीच ज़ैनब अब भी अपने पति का इंतज़ार कर रही है.

प्रमुख मानवाधिकार संगठन कोअलिशन ऑफ़ सिविल सोसायटी का कहना है कि पिछले दो दशक से भारत प्रशासित कश्मीर में चल रहे सशस्त्र संघर्ष में 1500 से 2000 महिलाएँ विधवाओं का जीवन गुज़ार रही हैं, क्योंकि उन्हें नहीं पता कि लापता हुए उनके पति जिंदा हैं भी या नहीं.

इनमें से कई को उम्मीद है कि उनके पति वापस आएँगे, लेकिन अधिकतर की उम्मीद की डोर अब टूट चुकी है. फिर भी इनमें से शायद ही कोई दोबारा शादी करना चाहती है.

टूटती डोर

शबनम की शादी 12 साल पहले ट्रक चालक अब्दुल रशीद से हुई थी और दो साल बाद ही वह लापता हो गए.

 मेरे माता-पिता ने दोबारा शादी के लिए बहुत दबाव डाला, लेकिन मैने बच्चों के बारे में सोचा. अब मैं ही उनकी माँ हूँ और बाप भी
शबनम

शबनम कहती हैं, "मेरे माता-पिता ने दोबारा शादी के लिए बहुत दबाव डाला, लेकिन मैने बच्चों के बारे में सोचा. अब मैं ही उनकी माँ हूँ और बाप भी."

अपने शौहर के बारे में बात करते हुए वो रो पड़ती हैं. वो कहती हैं, "मैं रशीद को अक्सर याद करती हूँ. अगर ये बच्चे नहीं होते तो मैं उनके बिना ज़िंदा नहीं रह सकती थी."

रफ़ीक़ा की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. लगभग 13 साल पहले लापता हुए पति का उन्हें आज भी इंतज़ार है.

वो कहती हैं, "अगर मुझे पता चल जाए कि मेरे शौहर दुनिया में नहीं रहे तो तसल्ली कर लेती, लेकिन हमें तो अंधेरे में रखा जा रहा है. हम सोचते हैं कि शायद वो ज़िंदा हैं."

रफ़ीक़ा कहती हैं, "ये अनिश्चितता मेरे, मेरे बच्चों और हर किसी के लिए बेहद पीड़ादायक है."

बदतर जिंदगी

लापता व्यक्तियों की पत्नियां
ये महिलाएँ महीने में कम के कम एक बार धरना देती हैं

विधवाओं सा जीवन गुज़ार रही इन महिलाओं की हालत इसलिए भी बदतर हैं कि उन्हें अपने पति के लिए इधर-उधर भटकना पड़ रहा है.

शबनम कहती हैं, "हम राज्य की तमाम जेलों का चक्कर लगाते-लगाते थक चुके हैं. बहुत पैसा ख़र्च हुआ. घर और घर का सामान तक बिक गया, लेकिन सब बेकार."

और तो और पति को खोजने के नाम पर कई लोगों इनसे पैसे ऐंठने से भी बाज़ नहीं आते.

रफ़ीक़ा कहती हैं, "कुछ लोग मेरे पास आए और कहा कि उन्होंने मेरे शौहर को देखा है. अपने पति को लाने के लिए मैने उन्हें मोटी रक़म दी. काश मैने ये पैसे अपने बच्चों के लिए बचाए होते."

बेज़ुबान

कोअलिशन फ़ॉर सिविल सोसायटी के अध्यक्ष परवेज़ अमरोज़ का कहना है कि विधवाओं का जीवन गुज़ार रही इन महिलाओं में से 85 फ़ीसदी ग़रीब हैं.

 कुछ लोग मेरे पास आए और कहा कि उन्होंने मेरे शौहर को देखा है. अपने पति को लाने के लिए मैने उन्हें मोटी रकम दी. काश मैने ये पैसे अपने बच्चों के लिए बचाए होते
रफ़ीक़ा

वो कहते हैं कि हाल ही में कराए गए एक सर्वेक्षण में सामने आया है कि अधिकतर लापता लोग समाज के ग़रीब और पिछड़े तबके से हैं.

मानवाधिकार हनन के सबसे अधिक मामले उनसे ही जुड़े हैं क्योंकि उनकी आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं है और न ही वे ताक़तवर हैं.

लेकिन इन महिलाओं ने हिम्मत नहीं हारी है. इन हालात का सामना कर रही अधिकतर महिलाएँ लापता व्यक्तियों के माता-पिता की एसोसिएशन (एपीडीपी) के बैनर तले महीने में कम से कम एक बार रैली निकालती हैं और धरना देती हैं.

हालाँकि उन्होंने राज्य के हाई कोर्ट में भी फ़रियाद की है, लेकिन न्याय को उन्हें अभी इंतज़ार ही है.

इन महिलाओं की सरकार से माँग है कि अगर उनके पति ज़िंदा नहीं हैं तो उन्हें मृत घोषित किया जाए.

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