BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
बुधवार, 24 अक्तूबर, 2007 को 14:05 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
जीवन की ढलती सांझ में मिला सहारा

कश्मीरी बुज़ुर्ग
अहमद को वृद्धाश्रम की ज़रूरत है
भारत-प्रशासित कश्मीर के कई बुज़ुर्गों ने मिलकर राज्य का पहला वृद्धाश्रम खोला है.

जहाँ माता-पिता को परंपरागत रूप से आदरणीय माना जाता हो वहाँ इस तरह के वृद्धाश्रम खोला जाना सामाजिक मूल्यों में आ रहे बदलावों को दर्शाता है.

परंपरागत तौर पर बेटे या बेटियाँ ही अपने बूढ़े माता पिता की देखरेख करते रहे हैं लेकिन कश्मीर घाटी में अब कई बुज़ुर्गों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है.

ऐसी ही एक बुज़ुर्ग हैं रिटायर्ड प्रोफ़ेसर एसएन गंजू जिनका बेटा दिल्ली में काम करता है और वहाँ से महीने में एकाध बार फ़ोन भर करता है.

बदलते मूल्य

प्रोफ़ेसर गंजू कहते हैं कि नए ज़माने के नौजवान धन-दौलत के पीछे भाग रहे हैं.

 हमारी परंपराएँ ख़त्म हो चली हैं. इसलिए सत्तर या अस्सी साल की उम्र के बुज़ुर्गों को एक ऐसी जगह चाहिए जहाँ वो खुलकर अपने दिल की बात कह सकें और ठहाके लगा सकें
प्रोफ़ेसर गंजू

उन्होंने कहा, "हमारी परंपराएँ ख़त्म हो चली हैं इसलिए सत्तर या अस्सी साल की उम्र के बुज़ुर्गों को एक ऐसी जगह चाहिए जहाँ वो खुल कर अपने दिल की बात कह सकें और ठहाके लगा सकें."

उनका कहना है कि इससे बुज़ुर्गों को मानसिक संतोष मिलेगा क्योंकि नौजवानों के पास उनके लिए समय ही नहीं है.

अठत्तर साल से ग़ुलाम मोहम्मद डार एक व्यापारी हैं और उनकी ही पहल पर कश्मीर में काउंसिल ऑफ़ सीनियर सिटिज़ंस संस्था खुली है.

वो कहते हैं कि संयुक्त परिवार में रहने वाले बुज़ुर्ग भी अकेलापन महसूस करते हैं क्योंकि नई पीढ़ी की बुज़ुर्गों के प्रति सोच बदल चुकी है. वो मानते हैं कि ज़िंदगी की तेज़ रफ़्तार और बढ़ता भौतिकवाद ही इसका कारण है.

कश्मीरी बुज़ुर्ग
अनिश्चित भविष्य बुज़ुर्गों के सामने मुँह बाए खड़ा है

ग़ुलाम मोहम्मद डार कहते हैं, "मेरे बेटे व्यवसाय में हैं और देर रात गए घर लौटते हैं. जिसना समय उनके पास होता है वो अपने बच्चों के साथ बिताते हैं. माँ-बाप के लिए तो एक पल भी नहीं है."

एक पूर्व आइएएस अधिकारी सैयद अहमद क़ादरी बीस साल पहले कश्मीर की नौकरशाही में काफ़ी जाने जाते थे लेकिन आज वो कहते हैं कि वृद्धाश्रम जाने वालों में वो पहले व्यक्ति होंगे.

अस्सी वर्ष की उम्र में भी वो काफ़ी स्वस्थ हैं, बेहरतीन और सुरुचिपूर्ण लिबास पहनते हैं और जीवन से संतुष्ट हैं. लेकिन वो जीवन में अकेलापन महसूस करते हैं.

अकेलापन

उन्होंने कहा,"मैं पूरी तरह स्वस्थ हूँ. नौकर चाकर रखने लायक़ काफ़ी पैसा मेरे पास है. लेकिन मुझे वो सहारा नहीं मिलता जिसकी मुझे दरकार है." वो मानते हैं कि वृद्धाश्रम एक बहुत अच्छी शुरुआत हो सकती है.

ग़ुलाम मोहम्मद डार ने बताया कि इस आश्रम में शुरूआत में एक क्लब जैसी सुविधा होगी ताकि बुज़ुर्ग गपशप और खेलों का आनंद ले सकें. बाद में इस आश्रम का विस्तार किया जाएगा और फिर यहाँ लोग रह भी सकेंगे.

लेकिन अकेलापन ही एकमात्र कारण नहीं है जो बुज़ुर्गों को परेशान किए हुए है. बहुत सारे ऐसे लोग हैं जिनके पास पर्याप्त पैसा ही नहीं है.

कश्मीर के घर
अब घरों में बुज़ुर्गों के लिए जगह नहीं है

ऐसे ही लोगों में से हैं अली मोहम्मद जिन्होंने चार साल पहले बढ़ई का काम बंद कर दिया था और अब अपने परिवार के साथ रहते हैं. पिछले चार साल से उन्हें वृद्धावस्था पेंशन नहीं मिली है.

उनका कहना है कि प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण उन्हें नुक़सान उठाना पड़ रहा है. कभी अधिकारी नहीं मिलते तो कभी कर्मचारी. अली मोहम्मद जैसे लोगों को भी वृद्धाश्रम से काफ़ी उम्मीदें हैं.

नौजवान पीढ़ी

लेकिन नौजवान पीढ़ी के कुछ लोग मानते हैं कि ज़रूरी नहीं कि ऐसे वृद्धाश्रम कारगार साबित हों.

उनतीस साल के तारिक़ अंदराबी कपड़े की दुकान चलाते हैं और कहतै हैं कि "ये कोई बहुत अच्छा उपाय नहीं है."

उन्होंने कहा, "बुज़ुर्ग ख़ुद अपनी बदहाली के लिए ज़िम्मेदार हैं. उन्होंने अपने बच्चों को नौतिक शिक्षा तो दी नहीं, भौतिकवादी मूल्य दिए हैं."

 माँ-बाप ने तो सिखाया कि डॉक्टर बनो, इंजीनियर बनो, अमरीका जाओ. अब ज़ाहिर सी बात है बच्चे लौटना नहीं चाहते
तारिक़ अंदराबी, नौजवान

"माँ-बाप ने तो सिखाया कि डॉक्टर बनो, इंजीनियर बनो, अमरीका जाओ. अब ज़ाहिर सी बात है बच्चे लौटना नहीं चाहते."

लेकिन व्यापारी सैयद मुश्ताक़ तर्क देते हैं कि नौजवान लोगों को अपने माता पिता के ख़स्ता हाल के प्रति ज़िम्मेदार होना चाहिए. पर वो मानते हैं कि माता पिता को भी नई पीढ़ी की मजबूरियों को समझना चाहिए.

वो कहते हैं, "मैं अभी अविवाहित हूँ. तड़के काम पर जाता हूँ देर शाम गए लौटता हूँ. इसका मतलब ये नहीं है कि मैं अपने माता पिता को नज़रअंदाज़ कर रहा हूँ."

सामाजिक मनोवैज्ञानिक एआर राथर कहते हैं कि बुज़ुर्गों का बुरा हाल इसलिए हो रहा है क्योंकि सामाजिक मान्यताओं बदल रही हैं.

"अब व्यक्तिवाद और प्रतियोगिता पर बहुत ज़ोर है. संयुक्त परिवार टूट चुके हैं और शादी के बाद बच्चे अपने माता पिता से अलग हो जाते हैं.

पर ऐसा भी नहीं है कि पुरानी मान्यताओं को पूरी तरह त्याग दिया गया हो.

सॉफ़्टवेयर इंजीनियर बिलाल मलिक पाँच साल तक लंदन में रह कर काम कर चुके हैं.

वो कहते हैं कि वो अपने माता-पिता की देखभाल करने के लिए ही कश्मीर लौटे हैं.

श्रीनगरघाटी का पहला वृद्धाश्रम
कश्मीर घाटी का पहला वृद्धाश्रम श्रीनगर में खुलने जा रहा है. जानिए क्यों.
बर्फ़बारीबर्फ़बारी का मज़ा
भारत प्रशासित कश्मीर में बर्फ़बारी
उमर अब्दुल्लाएक मुलाक़ात
अब्दुल्ला परिवार के वारिस और लोक सभा सांसद उमर अब्दुल्ला से एक मुलाक़ात.
ख़ानका-ए-मौलाकश्मीर की दरगाहें
आइए चलें अनोखी धार्मिक परंपरा की प्रतीक कुछ दरगाहों पर.
गुलाम नबी आज़ाद अमन की पहल तो हुई
गुलाम नबी आज़ाद कहते हैं कि पाकिस्तान के रवैये पर शांति प्रक्रिया निर्भर है.
भूकंपहौसले हैं बुलंद
जम्मू कश्मीर में भूकंप से तबाही हुई लेकिन लोगों ने हिम्मत नहीं हारी है.
भूकंपआशियाने की तलाश
भूकंप प्रभावित लोग अब परिवार के लिए छत का इंतज़ाम करने में जुटे हैं.
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>