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सोमवार, 19 नवंबर, 2007 को 11:23 GMT तक के समाचार
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ख़ानदान राजाओं का, नौकरी क्लर्क की

मियाँ ग़ुलाम अली
ग़ुलाम अली के पुरखों ने अपना महल एक सूफ़ी संत को दान कर दिया था
जम्मू-कश्मीर की पूर्व रियासत किश्तवार के राजाओं ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनके वंशजों को गुज़र-बसर के लिए इस तरह का काम भी करना पड़ेगा.

किश्तवार के राजाओं के वंशज मियाँ ग़ुलाम अली जीवनयापन के लिए एक निजी स्कूल में क्लर्क की नौकरी कर रहे हैं.

उन्हें विरासत में राजसी परिवार से सिवाय नाम के कुछ नहीं मिला.

ग़ुरबत के दिन

ग़ुलाम अली थकी हुई आवाज़ में कहते हैं, "मैने सुना है कि हमारे बुजुर्ग यहाँ के राजा थे. लेकिन मैने ग़ुरबत के अलावा कुछ नहीं देखा."

 मैने सुना है कि हमारे बुजुर्ग यहाँ के राजा थे. लेकिन मैने ग़ुरबत के अलावा कुछ नहीं देखा
ग़ुलाम अली

दरअसल, किश्तवार के राजा पहले हिंदू हुआ करते थे. फिर 1661 में राजा कीरत सिंह ने इस्लाम धर्म अपना लिया.

इसके बाद यहाँ के राजाओं की ख़ासियत यह रही कि वह हिंदू-मुस्लिम नाम रखते थे. जैसे कीरत सिंह बाद में मोहम्मद कीरत सिंह बन गए.

ऐसी परंपरा इंडोनेशिया में भी है. जहाँ लोग हिंदू-मुस्लिम नाम रखते हैं.

वर्ष 1821 में किश्तवार के राजा मोहम्मद तेग सिंह को जम्मू के राजा गुलाब सिंह के जनरल जोरावर सिंह ने हरा दिया और इस रियासत को अपने में मिला लिया.

महल दान

उन्नीसवी सदी में मियाँ ग़ुलाम अली के पुरखों ने किश्तवार में अपना महल सूफी संत शाह फ़रीदुद्दीन को दे दिया. वे फ़रीदुद्दीन से बहुत प्रभावित थे.

बाद में ग़ुलाम अली के पुरखे कहीं और जाकर बस गए.

ग़ुलाम अली के पिता गांदर जू किश्तवार में दर्जी का काम करते थे.

ग़ुलाम अली कहते हैं, "मेरे पैदा होते ही वह गुज़र गए. फिर मेरे चाचा मियाँ मोहम्मद ने मुझे गोद ले लिया, पर मैं कोई डेढ़ बरस का रहा हूँगा, वह भी नहीं रहे और मुझे मेरी चाची ने पाला."

 जीवन चाहे ग़ुरबत और कठिनाइयों से भरा रहा, लेकिन लोगों में इस बात की इज्ज़त थी कि हम राजा के खानदान से हैं
ग़ुलाम अली

चाचा भी इसी स्कूल में चपरासी का काम करते थे और उनकी तनख़्वाह पाँच रूपए महीना थी.

वो कहते हैं, " जीवन चाहे ग़ुरबत और कठिनाइयों से भरा रहा, लेकिन लोगों में इस बात की इज्ज़त थी कि हम राजा के खानदान से हैं."

बड़ी मुश्किल से बारहवीं तक पढाई कर ग़ुलाम अली एक निजी स्कूल में बीस वर्ष पहले जूनियर असिस्टेंट भर्ती हुए और अब वह सीनियर असिस्टेंट हैं.

वो कहते हैं, "दिल मैं बहुत फ़ख़्र महसूस होता है जब लोग कहते हैं कि हम राजसी खानदान से हैं, लेकिन ज़िंदगी में सिर्फ़ ग़ुरबत और मुश्किलात ही देखी हैं."

पहले तो किराये के दो कमरों में ही रहते थे, अब मैने पास में हिदयाल गांव में तीन कमरे बनाए हैं और अपने तीन बच्चों- दो बेटियाँ और एक बेटे- के साथ वहीं रहता हूँ.

भरी हुई आवाज़ में ग़ुलाम अली कहते हैं, "बच्चों को भी मालूम है कि हम बड़े खानदान से हैं, लेकिन मजबूरियों से वो आगाह हैं. उन्हें अच्छी तालीम दे कर पाँव पर खड़ा करना चाहता हूँ. अब यही मेरा सरमाया हैं".

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