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अमरीका मुश्किल दोराहे पर | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान की स्थिति लेकर अमरीकी राष्ट्रपति बुश एक गहरे असमंजस में फंस गए हैं. वे एक दोराहे पर खड़े हैं, एक तरफ़ 'आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई' है तो दूसरी ओर लोकतंत्र का नारा. परवेज़ मुशर्रफ़ के इमरजेंसी लागू करने के बाद 'आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई' और लोकतंत्र की झंडाबरदारी एक साथ करना बुश के लिए संभव नहीं रह गया है. 'आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई' में अमरीका के निकट साझीदार पाकिस्तान में इमरजेंसी लगने से बुश की विदेश नीति के सामने वैचारिक संकट खड़ा हो गया है. अमरीका को पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान में अपने अभियान के लिए एक भरोसेमंद साझीदार की ज़रूरत है वहीं जल्द से जल्द लोकतंत्र बहाल करने का नारा बुलंद करना भी मजबूरी बन गया है. अमरीकी राष्ट्रपति भवन की ओर से जो पाकिस्तान के सैनिक शासक की जो आलोचना की गई है उसके शब्द बड़े नपे-तुले हैं और पूरी एहतियात बरती गई है. बुश ने अपनी 'गहरी निराशा' खुद प्रकट नहीं कि बल्कि इस काम के लिए विदेश मंत्री कोंडोलिज़ा राइस को चुना. अमरीकी राष्ट्रपति ने पाकिस्तान के मामले पर सिर्फ़ एक बार मुँह खोला है, उन्होंने कहा कि चुनाव यथाशीघ्र हों और मुशर्रफ़ वर्दी उतारने का वादा पूरा करें. सैनिक सहायता अमरीकी राष्ट्रपति ने पाकिस्तान को दी जाने वाली सैनिक सहायता बंद करने की धमकी नहीं दी, अमरीका पाकिस्तान को हर वर्ष एक अरब डॉलर की सैनिक सहायता देता है.
एक अरब डॉलर का आँकड़ा तो घोषित है लेकिन गुपचुप तरीक़े से दी जाने वाली सहायता और अधिक हो सकती है. अमरीकी विदेश मंत्री ने एक बार ज़रूर कहा था कि पाकिस्तान को मिलने वाली मदद की समीक्षा की जा रही है लेकिन अभी यह कोरी धमकी के अलावा कुछ नहीं है. राष्ट्रपति बुश ने ज़ोर देकर कहा है कि 'आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई' में परवेज़ मुशर्रफ़ उनके साझीदार बने रहेंगे. कई जानकारों को लगता है कि पाकिस्तान की ताज़ा घटनाओं के बाद मुशर्रफ़ के प्रति अमरीकी नीति में बदलाव आ सकता है, इसकी एक वजह ये भी है कि अमरीकी प्रशासन में एक तबक़ा 'आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई' में मुशर्रफ़ के प्रयासों से संतुष्ट नहीं है. अल क़ायदा के कई बड़े नेताओं ने पाकिस्तान में ठिकाने बना रखे हैं और तालेबान ने सीमावर्ती इलाक़े में अपनी पकड़ मज़बूत कर ली है. जहाँ तक लोकतंत्र की बात है, मुशर्रफ़ ने इमरजेंसी लगाकर लोगों की आशंकाओं को सही साबित कर दिया है, अपने राजनीतिक विरोधियों को परेशान करने में उन्होंने कसर नहीं छोड़ी है और वर्दी उतारने का वादा पूरा नहीं किया है. सीमित विकल्प अमरीका मुशर्रफ़ के रवैए से इसलिए भी ख़ुश नहीं है क्योंकि अमरीकी प्रशासन ने साफ़ कहा था कि इमरजेंसी न लगाई जाए, जिसे मुशर्रफ़ ने नहीं माना.
अमरीका में ये कहने वाले बहुत हैं कि मुशर्रफ़ पर विश्वास नहीं किया जा सकता लेकिन अमरीका के पास विकल्प न के बराबर हैं. अमरीका ने कोशिश की है कि मुशर्रफ़ और बेनज़ीर के बीच कोई समझौता हो जाए लेकिन उसकी राह भी आसान नहीं दिख रही. अमरीकी प्रशासन में कोई नहीं जानता कि अगर मुशर्रफ़ सत्ता से बाहर चले गए तो क्या होगा. जब से फ़लस्तीनी चुनाव में हमास की जीत हुई है तब से अमरीका की लोकतंत्र संबंधी नीति को लेकर ख़ासा सतर्क हो गया है. हाल तक अमरीकी विदेश मंत्रालय में वरिष्ठ अधिकारी रहे डैनियल मार्की का कहना है कि लोकतंत्र की स्थापना में देरी से 'आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई' में कमज़ोरी आ रही है, और सैनिक शासन होने के कारण चरमपंथ को बढ़ावा ही मिलेगा. मार्की कहते हैं कि लोकतंत्र और 'आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई' में से किसी एक को चुनने का सवाल ग़लत है, मार्की कहते हैं कि अमरीका को सफलता तभी मिल सकती है जबकि पाकिस्तान में मज़बूत लोकतंत्र हो और सेना विश्वसनीय हो. बस मुश्किल यही है कि यह सब आसान नहीं है. | इससे जुड़ी ख़बरें 'मुशर्रफ़ से मिलने का कोई इरादा नहीं'06 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस पाक को आर्थिक सहायता की समीक्षा05 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'चुनाव एक साल के लिए टल सकता है'04 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस आपातकाल से मुशर्रफ़ की मुश्किलें बढ़ेंगी04 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस कौन हैं अब्दुल हमीद डोगर?03 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस परवेज़ मुशर्रफ़ का मुश्किल दौर03 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'ये सब पाकिस्तान की ख़ातिर है'03 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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