BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
शुक्रवार, 19 अक्तूबर, 2007 को 08:52 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
'चरमपंथ से अकेले नहीं लड़ सकते'

धमाके
मरियाना मानती हैं कि चरमपंथ से कोई पार्टी अकेले नहीं लड़ सकती
पाकिस्तान में बेनज़ीर का आना तो पूरी तैयारी के साथ हुआ था पर इन धमाकों के बाद उस पूरे जोश की चमक फीकी हो गई है.

इस हमले ने एक बार फिर से साफ़ कर दिया है कि किसी एक राजनीतिक हलके में इतनी क्षमता नहीं है कि वो चरमपंथ के सवाल से अकेले निपट सके.

वर्तमान राष्ट्रपति मुशर्रफ़ हों, पाकिस्तान की फ़ौज हो, पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के लोग हों, नवाज़ शरीफ़ साहब हों या कोई और राजनीतिक पार्टी, देश में चरमपंथ की जो स्थिति है उससे ये अकेले नहीं निपट सकते.

अब जो ताज़ा स्थितियाँ बनी हैं, उसमें मुशर्रफ़ साहब को करना यह चाहिए कि देश के सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को (जो देश के अंदर हैं और जो बाहर हैं, उन्हें भी) बुलाकर एक गोलमेज अधिवेशन करें और मिलकर, साथ होकर चरमपंथ की चुनौती से निपटने के लिए रणनीति बनाएं.

इस घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि दहशतगर्दी किसी को माफ़ नहीं करती. मॉडरेट शक्तियों और चरमपंथी ताकतों के बीच जो बरसों से खुली ज़ंग चल रही थी, वह फ़िर खुलकर सामने आ गई है.

राजनीति पर असर

हालांकि पाकिस्तान की राजनीति पर इस हमले का कोई ज़्यादा असर पड़ेगा, इसकी गुंजाइश मुझे कम ही नज़र आती है.

पाकिस्तान पिछले आठ बरसों से इस तरह की कोई न कोई घटना या हमले से हम रूबरू होता रहा है.

हाँ, इतना ज़रूर माना जा रहा था कि बेनज़ीर और परवेज़ मुशर्रफ़ मिलकर चरमपंथ से निपटने के रास्ते पर आगे बढ़ सकते हैं.

 अब जो ताज़ा स्थितियाँ बनी हैं, उसमें मुशर्रफ़ साहब को करना यह चाहिए कि देश के सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को (जो देश के अंदर हैं और जो बाहर हैं, उन्हें भी) बुलाकर एक गोलमेज अधिवेशन करें और मिलकर, साथ होकर चरमपंथ की चुनौती से निपटने के लिए रणनीति बनाएं

अमरीका के जेहन में भी यह मंसूबा था कि बेनज़ीर और मुशर्रफ़ मिल-बैठकर दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ेंगे, उसे इस हमले से झटका लगा है.

हालांकि चरमपंथ से कैसे निपटा जाएगा, इसको लेकर किसी के पास कोई साफ़ मॉडल है ऐसा नहीं लगता. फिर भी इस दिशा में जो आशा बंधी थी, उसे ठेस पहुँची है.

हमला

जिस तरह का हमला हुआ है और जितनी तादाद में लोग इस हमले में मारे गए हैं उससे एक बार फिर से साफ़ हो गया है कि चरमपंथ किसी को माफ़ नहीं करता.

बेनज़ीर के स्वागत में कराची में चल रहे काफ़िले में जो हमला हुआ है वह काफ़ी दुखद है.

पाकिस्तान पीपुलस पार्टी( पीपीपी) के इतिहास में यह पहली घटना है जब जुलूस में कोई हादसा हुआ हो.ज़ुल्फ़ीकार भुट्टो के ज़माने से लेकर बेनज़ीर के ज़माने तक पीपीपी के किसी भी जुलूस में कभी कोई अशांति वाली बात नहीं हुई

बेनज़ीर को इस हमले की आशंका थी. उन्हें इस बात का अंदेशा था कि जब वह पाकिस्तान लौंटेंगी तो इस तरह का वाकया हो सकता है.

(बीबीसी संवाददाता रेहान फ़ज़ल से बातचीत पर आधारित)

इससे जुड़ी ख़बरें
'तालेबान नहीं, सरकार के लोग ज़िम्मेदार'
19 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस
कराची में धमाकों का आँखों देखा हाल
19 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस
देर रात हुआ हमला मुख्य पृष्ठों पर छाया
19 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस
बेनज़ीर भुट्टो के काफ़िले पर हमला
19 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस
हमले की कई देशों ने निंदा की
19 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस
बाल-बाल बचीं बेनज़ीर, सुरक्षा कड़ी
18 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>