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कराची में धमाकों का आँखों देखा हाल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान के कराची शहर में गुरुवार रात को पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो के काफ़िले पर हुए हमले में लगभग 130 लोगों की मौत हो गई है और कई अन्य घायल हो गए हैं. एक के बाद एक हुए दो धमाकों में बेनज़ीर भुट्टो बाल-बाल बचीं. घटनास्थल पर मौजूद कुछ पत्रकारों ने वहाँ का मंज़र इस तरह बयान किया: ''धमाकों के साथ हवा में आग की लपटें उठीं. मैं तुरंत उस तरफ भागा. एक और धमाका हुआ जो पहले से ज़्यादा जोरदार था. इसके बाद ही मेरी समझ में आया कि बम से हमला किया गया है. मेरे सामने खड़ा एक टेलीविज़न कैमरामैन मारा गया. हर तरफ़ शव बिखरे हुए थे. जख़्मी लोग दर्द से कराह रहे थे. फिर कोई धमाका न हो जाए, इस डर से कोई शवों के पास जा तक नहीं रहा था.'' अतर हुसैन, फ़ोटोग्राफर, रॉयटर्स ************************************* ''ट्रक (जिसमें बेनज़ीर मौजूद थीं) के सामने का काँच टुकड़े-टुकड़े हो गया. बगल की खिड़कियाँ निकल गईं. आसपास पड़े निशानों से ऐसा लगता है कि ये आत्मघाती हमला का काम होगा. चारों तरफ़ तबाही और नरसंहार का मंज़र है. सड़कों पर ख़ून पसरा है. शवों को एंबुलेंस ले जा रही हैं. एक आदमी छाती पीट रहा है. उसके भाई की धमाकों में मौत हो गई है. सचमुच दिल दहला देने वाला नज़ारा है. सामने खड़ी पुलिस की एक कार अब बस कबाड़ रह गई है.'' बीबीसी के डैमियन ग्रमाटिकस ************************************* ''बेनज़ीर जानती थीं कि वो निशाने पर हैं. मैं उनसे इन्हीं ख़तरों पर बात कर रही थी. वो इस बात को लेकर चिंतित थीं कि वहां बिजली नहीं थी. 'स्ट्रीट लाइटें' बुझी थीं. निशानेबाज़ मकानों की छत और पुल पर भी हो सकते थे. सौभाग्य से बस में अंदर उतरने के लिए सीढ़ी थी. धमाकों से थोड़ी देर पहले ही आराम करने के लिए वो नीचे उतरी थीं. उस वक़्त वह बस की छत पर नहीं थीं, इसलिए बाल-बाल बच गईं.'' क्रिस्टीना लैंब, ब्रितानी पत्रकार ************************************* इस काफ़िले में शामिल कुछ अन्य चश्मदीदों ने भी घटना के बारे में बीबीसी को बयान दिए : ''हम धमाके की जगह से कुछ फ़ासले पर थे. यकायक एक धमाका हुआ तो काफ़िले में अफ़रा-तफरी मच गई. लोगों ने बचाव के लिए इधर-उधर भागना शुरू कर दिया. इसी के कुछ देर बाद दूसरा धमाका हुआ जो और भी ज़ोरदार था. दोनों धमाकों में दो-चार मिनट का ही अंतर था.'' ************************************* ''पहला धमाका ज़रा कमज़ोर था पर दूसरा धमाका बहुत ही तेज़ था और उसी में ज़्यादा लोग मारे गए हैं. पहले धमाके के वक़्त मैं मोबाइल वैन के पास ही था और वहाँ एक घायल व्यक्ति को हटाने की कोशिश कर रहा था जिसकी एक टाँग टूट गई थी. इसी के चंद लम्हों बाद दूसरा तेज़ धमाका हुआ और यह बहुत तेज़ धमाका था. इसमें सबसे ज़्यादा लोगों की मौत हुई है.'' ************************************* ''पहला धमाका हुआ तो समझ में ही नहीं आया कि क्या हुआ है. पहले लगा कि कोई ऐसा ही धमाका है पर जब हमने धुँआ उठता देखा तो समझ आया कि विस्फोट हो गया है.
इसके तुरंत बाद हम लोग लाशें उठाने के लिए लपके. तभी एक दूसरा और तेज़ धमाका हुआ. हमने देखा की एक ऑल्टो गाड़ी थी जिसमें से आग निकल रही थी और ऐसा मालूम दे रहा था कि उसमें काफ़ी बारूद रहा होगा. हमारे कई साथी इसमें मारे गए हैं. मैंने ख़ुद 40-45 लोगों को हटाने में मदद की है. दिक्कत यह हो रही है कि कई लोगों के जिस्म धमाके के कारण बिखर गए हैं और चारों तरफ़ माँस के लोथड़े बिखरे हुए हैं. बस यही मेहरबानी रही ऊपर वाले की कि बेनज़ीर सलामत हैं.'' ************************************* ''मैं उस वक्त पानी पी रहा था, तभी एक धमाके की आवाज़ सुनाई दी. हम लोग धमाके की जगह आगे की ओर लपके ताकि पता चले कि क्या हुआ लेकिन तभी 2-4 मिनट बाद ही दूसरा धमाका हो गया. यह धमाका पहले धमाके से कहीं तेज़ था और इसमें ही सबसे ज़्यादा जानें गई हैं.'' ************************************* ''कैसे हो गए ये धमाके. जब सरकार को मालूम था कि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की मुखिया आ रही हैं तो सुरक्षा के सारे इंतज़ाम क्यों नहीं किए गए. यह सुरक्षा तो सरकार की ज़िम्मेदारी थी, फिर यह कैसे हो गया.'' | इससे जुड़ी ख़बरें 'तालेबान नहीं, सरकार के लोग ज़िम्मेदार'19 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस हमले की कई देशों ने कड़ी निंदा की19 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस बाल-बाल बचीं बेनज़ीर, सुरक्षा कड़ी18 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस बेनज़ीर के लिए कड़ी सुरक्षा व्यवस्था18 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस बेनज़ीर का राजनीतिक सफ़र 02 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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