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शनिवार, 20 अक्तूबर, 2007 को 16:25 GMT तक के समाचार
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तिब्बत की बदलती तस्वीर

तिब्बत में रेल लाईन
तिब्बत और बीजिंग के बीच ये रेललाईन पिछले साल बन कर तैयार हुई थी
चीन ने पिछले साल ही बीजिंग को रेललाईन के ज़रिए तिब्बत की राजधानी ल्हासा से जोड़ दिया था. इस रेलसंपर्क ने दुनिया की छत कहे जाने वाले तिब्बत पर गहरा असर डालना शुरू कर दिया है.

इस रेल सेवा की लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अगले साल भर तक के लिए इस ट्रेन में कोई टिकट उपलब्ध नहीं हैं.

इस रेल संपर्क ने जहां तिब्बत को चीन की मुख्यधारा से जोड़ने का काम किया है तो वहीं इसकी वजह से तिब्बत में बढ़ रहे चीनी दख़ल पर कई तरह की आशंकाएं भी जताई जा रही है.

तिब्बत डेली के संपादक लाओ जिया जिंग का इस रेल सेवा की ख़ासियतों के बारे में कहना है, "इस रेल से तिब्बती लोगों के जनजीवन में काफ़ी फ़र्क आया है, साथ ही तिब्बत में नये विचार पहुँच रहे हैं. व्यापार शुरू हुआ है, किसानों को नई तकनीक और यहाँ की कला और संस्कृति को नए बाज़ार मिल रहे हैं. वो फल-फूल रहे हैं."

पिछले साल की तुलना में इस साल सैलानियों की संख्या में 70 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है. इस साल जनवरी और अगस्त के बीच तिब्बत में लगभग 25 लाख पर्यटक पहुंचे थे.

इस रेल में हमारी मुलाकात जियांग प्रांत के सूचना तकनीक क्षेत्र में कार्यरत एक युवा से हुई जो ल्हासा में अपनी कंपनी के लिए नया बाज़ार ढूंढ रहे हैं.

इसके अलावा एक तिब्बती ऑपरा गायिका यांगलेंग बीजिंग में अपनी कला दिखाकर लौट रहीं थीं. यानी रेल से सूचना, सामान और लोगों की आवाजाही बढ़ रही है.

ल्हासा पहुंचने पर अब हवाई और सड़क मार्ग के बाद रेल सेवा से इसके जुड़ने का असर साफ़ दिखाई देने लगा है.

दलाई लामा
14वें दलाईलामा तिब्बतियों के धर्मगुरू के रूप में आज भी वहाँ लोकप्रिय हैं

चीन का दख़ल

चीन ने बौद्ध धर्म अनुयायी तिब्बती लोगों की स्वतंत्रता की कोशिशों को 1951 में कुचलने की कोशिश ज़रूर की पर अब भी यहां तिब्बत के सर्वोच्च धार्मिक नेता दलाई लामा की छाप मिटी नहीं है.

चीनी आक्रमण के बाद तिब्बत के चौदहवें दलाईलामा शरणार्थी के रूप में भारत आ गए थे जो आज भी चीन की आंखों की किरकिरी बने हुए हैं.

ल्हासा स्थित दलाईलामा के आवास पोटाला महल में 13वें दलाईलामा तक की चर्चा होती है. मौज़ूदा दलाईलामा की चर्चा कोई नहीं करता. यहां चीनी सरकार की सख़्त नज़र रहती है.

हालांकि भारतीयों की बजाए अमरीकी और जर्मन लोगों से प्रशासन ज़्यादा सतर्क रहता है जो अक्सर फ़्री तिब्बत और तिब्बत मुक्ति संघर्ष के हक़ में यहां सामग्री बांटते हैं.

लेकिन लोग दलाईलामा को बहुत ही सम्मान और शिद्दत के साथ याद करते हैं. एक महिला ने दिल पे हाथ रखकर हमसे फुसफुसाकर पूछा कि क्या हमने कभी दलाई लामा को देखा है. उनके लिए आस्था और धर्म बहुत मायने रखते है.

भारत के लिए प्रेम

तिब्बतियों में भारत के प्रति एक अलग तरह का प्रेम है. काफ़ी संख्या में लोग भारत से शिक्षा ले कर लौटे हैं. वे भारत को अपना दोस्त और हिमायती मानते हैं.

बदलाव
 इस रेल से तिब्बती लोगों के जनजीवन में काफ़ी फ़र्क आया है, साथ ही तिब्बत में नये विचार पहुंच रहे हैं. नए व्यापार शुरू हुए हैं, किसानों को नई तकनीक और यहां की कला और संस्कृति को नए बाज़ार मिल रहे हैं. वो फल-फूल रहे हैं
लाओ जियाजिंग, संपादक तिब्बत डेली

ल्हासा के बाखोर बाज़ार की दुकानों में हिंदी गाने सुनाई देते हैं. ब्यूटी पार्लरों में बालीवुड अभिनेत्री ऐश्वर्या रॉय समेत फ़िल्मी हस्तियों के पोस्टर नज़र आते हैं. यहां के राष्ट्रीय टेलीविज़न में हिंदी धारावाहिकों को तिब्बती भाषा में दिखाया जाता है.

ये दुकानदार कहते हैं कि सब कुछ तेज़ी से बदल रहा है. आबादी में चीन के हॉन मूल के लोगों की संख्या बढ़ रही है. जबकि सरकारी दावे कहते हैं कि तिब्बती अब भी यहां की आबादी का 92 फ़ीसदी हैं.

आम तिब्बती कहते हैं कि यहां हॉन आबादी 40 फ़ीसदी है और ऊंचे पदों पर चीनी लोग काबिज़ हैं. नौकरी के लिए चीनी भाषा आना भी ज़रूरी है. इसी कारण तिब्बती पिछड़ रहे हैं.

हालांकि चीनी प्रभाव के ख़िलाफ़ कोई कुछ खुलकर नहीं बोलता. उन्हें लगता है कि अगर वह बेबाक़ी से बात करेंगें तो उनकी जान को ख़तरा हो सकता है.

रेल चलाने के पीछे चीनी सरकार की सोच है कि विकास में जब तिब्बतियों की भागीदारी बढ़ेगी, संपन्नता बढ़ेगी तो स्वतंत्रता की मांग ख़ुद-ब-ख़ुद ठंडी पड़ जाएगी.

आज की तारीख़ में चीन एक बड़ी ताक़त है. तिब्बतियों की मुक्ति का समर्थन करने वाले देश भी खुलकर चीन का विरोध नहीं करते.

शायद अब तिब्बतियों को भी ये यथार्थ नज़र आ रहा है कि वे चीन में रह कर ही अपनी पहचान और संस्कृति बचाए रखे. साथ ही चीन की उन्नति में पूरी भागीदारी निभाए और उसका हिस्सा भी बने.

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