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साष्टांग करता तीर्थयात्री | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
शेराब ग्यालस्टन पिछले एक साल और आठ महीने से सड़कों पर हैं. वो न दौड़ते हैं न ही चलते हैं बल्कि साष्टांग करते हुए आगे बढ़ते हैं. तिब्बत से आए ग्यालस्टन तिब्बत से बोध गया तक की यात्रा साष्टांग करते हुए पूरी कर रहे हैं. वो तीन कदम चलते हैं फिर दंडवत प्रणाम की मुद्रा में झुकते हैं और फिर उठ कर मंत्रजाप करते हैं. एक दिन में पूरी होती है क़रीब छह किलोमीटर की यात्रा. बार बार ज़मीन पर लेट कर प्रणाम करना आसान नहीं है. शरीर छिल सकता है. हाथों पर छाले पड़ सकते हैं. ग्यालस्टन बचाव के लिए मोटा एप्रन पहनते हैं, पैरों में जूते और हाथों में लकड़ी के दस्ताने. ग्यालस्टन कुछ ही दिन नेपाल के रास्ते बिहार पहुंचे हैं जहां उनकी मंज़िल है बोध गया. अनुमान है कि ग्यालस्टन अगले पंद्रह दिनों में बोध गया के बोधिवृक्ष तक पहुंच सकेंगे जहां महात्मा बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था. तिब्बत में बौद्ध भिक्षुओं का मानना है कि साष्टांग प्रणाम करने से ज्ञान प्राप्ति का रास्ता आसान होने लगता है. ग्यालस्टन ने जुलाई 2005 में अपनी यात्रा शुरु की थी. ग्यालस्टन न तो हिंदी बोलते हैं और न ही अंग्रेज़ी. जब वो तिब्बत से चले थे तो उनके साथ कुछ दोस्त थे लेकिन नेपाल में वो दोस्त वापस चले गए. नेपाल से उनका साथ दे रही है एक दंपत्ति सोनम येशी और पेमा त्सोमो. ये दंपत्ति ग्यालस्टन की दैनन्दिन ज़रुरतों का ध्यान रखती है. सोनम येशी बताती है 'हमारे पास तंबू हैं. स्लीपिंग बैग हैं,एक स्टोव है और खाने का सामान है. हम किसी से पैसे नहीं लेते लेकिन लोग मदद करते हैं.' ग्यालस्टन हिंदी बोल नहीं पाते हैं लेकिन वो स्थानीय लोगों से बात करने की कोशिश करते हैं इशारों में ही सही. कुछ नहीं तो मुस्कुरा भर देते हैं. खाना पीना
सोनम येशी बताती हैं कि तीनों के लिए चावल, गेहूं, और फल हैं जिन्हें वो बना कर खाते हैं. दिन में दो बार सुबह दस बजे और शाम के छह बजे. इसके अलावा रास्ते में लोग चाय और पानी दे देते हैं जिसे वो खुशी से स्वीकार करते हैं. लेकिन क्या बिहार में दिक्कत नहीं होती है. पेमा कहते हैं नहीं नहीं बिल्कुल नहीं. ग्यालस्टन की दिक्कतों के बारे में सोनम येशी बताती हैं कि रास्ते बहुत खराब हैं और कभी कभी ट्रक और बड़ी गाड़ियों से दिक्कत होती है. ग्यालस्टन कहते हैं ' कहीं कहीं तो सड़क ही नहीं है. गडढे ही गडढे हैं. ये तो नेपाल की पहाड़ियों से भी ख़तरनाक हो जाता है. ' साष्टांग प्रणाम करते हुए आगे बढ़ते इस तीर्थयात्री को देखने के लिए काफी लोग जुटते हैं और उसकी मदद करने की कोशिश भी करते हैं लेकिन कुछ लोग उन्हें शक की दृष्टि से भी देखते हैं. ग्यालस्टन की तबीयत इतनी कठिन यात्रा के बाद भी ठीक है और वो उम्मीद करते हैं कि बोध गया तक वो ठीक रहेंगे. | इससे जुड़ी ख़बरें तस्वीरों में: 2002 की मिस तिब्बत प्रतियोगिता11 अक्तूबर, 2002 | पहला पन्ना बोधगया में कालचक्र महोत्सव | भारत और पड़ोस 'अभियान पर असर नहीं' | भारत और पड़ोस 'मिस तिब्बत' प्रतियोगिता पर संकट08 अक्तूबर, 2003 को | भारत और पड़ोस बड़े रंगीले थे छठे दलाई लामा13 जून, 2005 | पत्रिका चीन में पंचेन लामा नज़र आए13 अप्रैल, 2006 | पहला पन्ना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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