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बुधवार, 17 अक्तूबर, 2007 को 12:01 GMT तक के समाचार
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दोषी पुलिसकर्मियों को मृत्युदंड की माँग
अदालत के फ़ैसले पर अख़बारों की राय
फ़र्जी मुठभेड़ मामले में अदालत का फ़ैसला आने में दस साल लग गए
दिल्ली के कनाट प्लेस इलाक़े में वर्ष 1997 में एक मुठभेड़ में मारे गए दो व्यावसायियों प्रदीप गोयल और जगजीत सिंह के परिवारों ने माँग की है कि दोषी पुलिसकर्मियों को मौत की सज़ा दी जानी चाहिए.

दिल्ली की एक निचली अदालत ने उस मुठभेड़ के मामले में दस पुलिस अधिकारियों को उन दो व्यावसायियों की हत्या का दोषी क़रार दिया है.

वह मुठभेड़ कनाट प्लेस की व्यस्त सड़क पर दिन-दहाड़े हुई थी जिसमें कार में सवार ये दो व्यावसायी मारे गए थे. दोषी पुलिसकर्मियों को 24 अक्तूबर को सज़ा सुनाई जाएगी.

उस मुठभेड़ में शामिल पुलिसकर्मियों की दलील है कि उन्होंने ग़लती से उन व्यावसायियों को बदमाश समझ लिया था.

ऐसे आरोप लगाए गए थे कि पुलिस ने अपनी ग़लती पर पर्दा डालने के लिए उस कार में एक पिस्तौल छुपा दी थी.

पुलिस ने दावा किया था कि में सवार लोगों ने ही पहले गोली चलाई थी लेकिन अदालत ने पुलिसकर्मियों की इस सफ़ाई को ख़ारिज कर दिया.

बीबीसी संवाददाता का कहना है कि इस मामले में कई बार बहुत देरी हुई लेकिन आख़िरकार न्याय व्यवस्था ने अपना काम किया है.

मारे एक एक व्यावसायी जगजीत सिंह के पिता निरंजन सिंह ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "जी हाँ, न्याय होने में दस साल लग गए हैं. अनेक ऐसे भी मौक़े आए जब हमारी हिम्मत टूटती नज़र आई लेकिन हमने यह भरोसा कभी नहीं छोड़ा कि हमें न्याय मिलेगा."

हालाँकि यह एक काफ़ी मुश्किल उदाहरण है क्योंकि पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया जाना बहुत मुश्किल काम है.

इस मामले में भी दिल्ली पुलिस के तत्कालीन कमिश्नर को कोई सज़ा नहीं हुई है. दरअसल वह पुलिस कमिश्नर इस समय कांग्रेस के एक सांसद हैं.

सुधारों की ज़रूरत

मानवाधिकारों के लिए काम करने वाले एक कार्यकर्ता कॉलिन गोंज़ाल्वेज़ पुलिस की कार्यप्रणाली पर ख़ासे ख़फ़ा नज़र आते हैं.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "पुलिसकर्मियों को हथियारों का घोड़ा दबाने में मज़ा आता है. उनके पास लोगों को मारने का लाइसेंस होता है और पिछले दस साल में न्याय व्यवस्था ने पुलिस के हाथों हो रही हत्याओं की घटनाओं की तरफ़ से आँख मूंद ली थी क्योंकि शिकार ग़रीब लोग हो रहे थे."

किरण बेदी
किरण बेदी पुलिस सुधारों की हिमायती हैं

कॉलिन गोंज़ाल्वेज़ का कहना है कि कनाट प्लेस की इस घटना पर पुलिसकर्मियों को सज़ा होना एक स्वागत योग्य फ़ैसला है लेकिन यही काफ़ी नहीं है क्योंकि ऐसी कम से कम 200 मामले आए हैं जिनमें पुलिस बेदाग़ बचकर निकल गई है.

यह बहुत निराशाजनक स्थिति है लेकिन कम से कम लोग यह तो समझने ही लगे हैं कि पुलिस के अधिकार बहुत भ्रष्ट हो गए हैं और राजनीतिक नेता तो और भी ज़्यादा भ्रष्ट हो गए हैं लेकिन ऐसे भी लोग हैं जो इस स्थिति को बदलने की ज़रूरत है.

रिपोर्ट नहीं

पंजाब में मंगलवार को एक अदालत ने एक सिख मानवाधिकार कार्यकर्ता की हत्या के दोषी पाए गए चार पुलिसकर्मियों की जेल की सज़ा में बढ़ोत्तरी कर दी.

कोलकाता में एक अदालत ने एक स्थानीय युवक रिज़वान उर्रहमान की विवादास्पद मौत की जाँच केंद्रीय जाँच ब्यूरो-सीबीआई से कराने का आदेश दिया है.

लेकिन बहुत से ऐसे मामले होते हैं जो प्रकाश में ही नहीं आते या फिर उनकी रिपोर्ट ही नहीं होती.

भारत की पहली महिला आईपीएस अधिकारी किरण बेदी पुलिस सुधारों की हिमायत करती रही हैं. उनका कहना है, "इस देश में कुछ समय से पुलिस पर लोगों का भरोसा कम हुआ है और पुलिस को भरोसे की एक बड़ी ज़मीन फिर से बनाने की ज़रूरत है."

बीबीसी संवाददाता क्रिस मॉरिस का कहना है कि कनाट प्लेस भारत का एक ऐसा इलाक़ा है जो देश की आर्थिक प्रगति की छवि पेश करता है जहाँ लोगों की भीड़ है, तेज़ी से होता कारोबार है मगर जैसे-जैसे भारत आर्थिक शक्ति बनने की ओर बढ़ रहा है, उसे बहुत से क्षेत्रों में व्यापक सुधार की ज़रूरत भी है.

एक आम नागरिक के लिए कनाट प्लेस अब भी एक ऐसा इलाक़ा है जहाँ 1997 में हुई फ़र्ज़ी मुठभेड़ के मामले में न्याय मिलने में इतनी देर लग सकती है.

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