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सदभावना का संदेश देती दरगाह | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
राजस्थान में अजमेर स्थित महान सूफ़ी संत ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह कोई 800 साल से पूरी दुनिया को शांति और सदभावना का संदेश देती रही है. पहाड़ियों की गोद में आबाद अजमेर की इस दरगाह पर शीश नवाने क्या अमीर क्या ग़रीब, हर जात और मजहब के लोग आते रहे हैं. इस दरगाह ने वो दौर भी देखा है जब मुग़ल बादशाह अकबर आगरा से पैदल चलकर आए और यहाँ इबादत की. मन्नत पूरी हुई तो अकबर साल में एक बार अजमेर आना नहीं भूलते थे. स्थापना अजमेर की स्थापना राजा अजयपाल चौहान ने सातवीं शताब्दी में की थी इसलिए इसे अजमेर नाम मिला. जब ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती ने अमन और मोहब्बत का पैग़ाम दिया तो लोग इसे अजमेर शरीफ़ भी कहने लगे. यूँ ख़्वाजा ईरान से आए थे, लेकिन बाद में वे इसी स्थान के होकर रह गए और जीवनभर इंसानियत और भाईचारे की आवाज़ बुलंद करते रहे. दरगाह का विशाल दरवाजा हैदराबाद के निज़ाम ने बनवाया था. बादशाह अकबर और जहाँगीर ने दो बड़े देग या विशाल आकार के कड़ाह भेंट किए, जो आज भी सलामत हैं और इन देगों में श्रद्धालुओं के लिए शाकाहारी प्रसाद या तबर्रुक पकाकर वितरित किया जाता है. अहमियत ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती ने यहीं से दुनिया को अलविदा किया. जिसे उनके अकीदतमंद कहते हैं- दुनिया से पर्दा किया. दरगाह में उस स्थान पर संगमरमर का मज़ार बना है, उसके गिर्द शाहजहाँ ने चाँदी का प्लेटफॉर्म बनवाया था. दरगाह में संगमरमर से बनी अकबरी मस्जिद है जिसका निर्माण शाहजहाँ ने करवाया था. इस्लामी कलैंडर के मुताबिक रजब की पहली से छठी तारीख़ तक ख़्वाजा का सालाना उर्स आयोजित किया जाता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु यहाँ इबादत करने आते हैं. उस दौरान पाकिस्तान और बांग्लादेश से भी बड़ी संख्या में जायरीन अपनी मन्नत लेकर यहाँ आते हैं. ख़्वाजा की खिदमत में लगे सैकड़ों खादिम स्वयं को उनके परिजन बताते हैं और कहते हैं कि उस महान सूफ़ी संत ने जो परंपरा प्रारंभ की थी, उसे चिश्तिया सिलसिला कहते हैं. सुरक्षा दरगाह के दीवान जैनुएल आबेदिन खुद को ख़्वाजा का सीधा वंशज बताते हैं, लेकिन दरगाह प्रबंधन को लेकर प्राय उनकी तकरार होती रहती है. बदलते दौर में दरगाह की सुरक्षा को लेकर चिंता बनी तो दो महीने पहले ही दरगाह के भीतर 16 सीसीटीवी कैमरे लगाए गए. दरगाह के नाजिम अहमद रजा ने बीबीसी से कहा, "ये कैमरे ठीक थे और हर चीज की तस्वीर उतार रहे थे." लेकिन पुलिस का कहना है कि घटना के बाद कैमरे को जोड़ने वाले तार टूटे हुए मिले. इस दरगाह के प्रति श्रद्धा को जात-धर्म में नहीं बाँटा गया. हिंदू और मुसलमान समान भाव से यहाँ इबादत करने आते हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें इस बार दरगाह के ख़ादिम नहीं मनाएंगे ईद12 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस अजमेरः पूछताछ जारी, निष्क्रिय किया गया विस्फोटक12 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस अजमेर की दरगाह में धमाका, दो की मौत11 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'धमाका सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश'11 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस अजमेर दरगाह में धमाके के बाद अलर्ट11 अक्तूबर, 2007 | भारत और पड़ोस अजमेर में औरतों की इबादत पर विवाद15 जून, 2006 | भारत और पड़ोस जनरल नहीं, श्रद्धालु मुशर्रफ़ ने मत्था टेका16 अप्रैल, 2005 | भारत और पड़ोस बेनज़ीर निजी यात्रा पर भारत आईं01 अप्रैल, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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