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जनरल नहीं, श्रद्धालु मुशर्रफ़ ने मत्था टेका | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पवित्र दरगाह के निज़ाम गेट से जब पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ दरगाह में दाखिल हुए तो शादियाले बाजार पारंपरिक तरीक़े से उनका स्वागत किया गया. हालांकि कड़े सुरक्षा प्रबंधों की वजह से दरगाह में न तो श्रद्धालुओं की रौनक थी और न ही सूफ़ियाना कव्वाली का शोर. चप्पे-चप्पे पर पुलिस तैनात थी. राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने ख़्वाज़ा की चौखट पर शीश नवाया और ज़ियारत की. ज़ियारत के बाद श्री मुशर्रफ़ ने संवाददाताओं को बताया कि वो यहाँ शांति का संदेश लेकर आए हैं. दरगाह में ख़ादिंमों की संस्था, अंजुमन ने जब उन्हें रूहानीयत की स्याही से लिखा सिपासनामा यानी अभिनंदन पत्र भेंट किया तो जनरल मुशर्रफ बहुत खुश हुए. जनरल मुशर्रफ ने अंजुमन की अतिथि-पुस्तिका में लिखा कि वे दोनों देशों में खुशहाली की कामना करते हैं. राष्ट्रपति मुशर्रफ़ की इस यात्रा से अजमेरशरीफ़ को अभूतपूर्व सुरक्षा प्रबंधों का सामना करना पड़ा. अजमेर रोडवेज़ की बसें तीन घंटों तक सड़कों पर नहीं निकल सकीं और हजारों यात्री परेशान होते रहे. दरगाह के ख़ादिम अब्दुल अलीम बताते हैं, " बड़ौदा से आए शब्बीर ख़ासे नाराज़ थे. कहने लगे, "इस अतिविशिष्ट मेहमान की मौजूदगी से हजारों ज़ायरीन की इबादत में खलल पड़ा है." यह दरगाह सैकड़ों भिखारियों का भी पेट भरती है. वे भी नाराज दिखाई दिए. मुशर्रफ़ एक फौजी जनरल की तरह नहीं, बल्कि एक विनम्र श्रद्धालु की तरह झोली फैलाए आए. एक पखवाड़े पहले बेनज़ीर भुट्टो भी यहाँ कुछ माँगकर गई हैं. अब मुशर्रफ़ ने भी हाजिरी दी है. ख़्वाजा के पास देने को बहुत कुछ है लेकिन रहनुमाओं को केवल तख्तो-ताज़ चाहिए. |
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