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सोमवार, 03 सितंबर, 2007 को 18:21 GMT तक के समाचार
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बाज़ार में आया चीनी कन्हैया

चीन निर्मित कलाकृति
भारतीय बाज़ारों में चीन निर्मित कृष्ण की मूर्तियों की धूम है
एक ओर जहाँ अमरीका और यूरोपीय देशों में चीनी खिलौनों पर प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं, वहीं भारत में हर जगह सस्ते चीनी साज़ो सामान उपलब्ध हैं. श्रृंगार और प्रेम का पर्व जन्माष्टमी भी इससे अछूता नहीं रहा.

दीवाली में चीनी लड़ियाँ, चीन के बने रंग-गुलाल और चीनी राखियों के बाद अब जन्माष्टमी के अवसर पर चीन से आई कृष्ण की मूर्तियों की धूम है.

रंग-बिरंगे कपड़ों में मोती-मनके और मोरपंख से सजे मटकी से माखन चुराते कृष्ण की चीनी मूर्तियों से बाज़ार पटे हुए हैं. ये मूर्तियाँ रेजिन और फाइबर से बनी हुई हैं.

देहरादून के पलटन बाज़ार में दुकानदार प्रशांत कहते हैं, “इस बार चीनी मूर्तियों का क्रेज़ है. इनकी ख़ासियत ये है कि इनकी चमक लंबे समय तक बनी रहती है और गिरने से ये टूटती नहीं हैं जबकि तांबे या पत्थर की बनी भारतीय मूर्तियां नाज़ुक होती हैं.”

बेहद सस्ता

मूर्तियों में नयापन और बेहद सस्ते होने के कारण लोग बड़े पैमाने पर इन्हें ख़रीद रहे हैं. पूजा के लिये मूर्ति ख़रीदने आईं गीता गैरोला कहती हैं, “इनकी क़ीमत बहुत कम है.हमें पूजा ही तो करनी है. मूर्ति चीन से आई हो या मथुरा से.. हैं तो कृष्ण ही.”

 इनकी क़ीमत बहुत कम है.हमें पूजा ही तो करनी है. मूर्ति चीन से आई हो या मथुरा से.. हैं तो कृष्ण ही
गीता गैरोला

कॉलेज के छात्र संजय ममगई का कहना है कि अगर भक्ति की बात करें तो भारतीय सामग्री से ही उसकी सही भावना आती है लेकिन चीनी मूर्तियाँ इतनी सस्ती हैं कि हर कोई उन्हें ख़रीद सकता है, इस लिहाज से मैं उन्हें अच्छा मानता हूँ.

परंपरावादी लोगों के इस रूख़ पर हैरान और चिंतित शास्त्री पंडित विद्याधर भट्ट कहते हैं, "पहले लोग चीनी मूर्तियों को उपहार में देते थे या बैठक में सजाते थे लेकिन अब इनका प्रवेश पूजाघर में भी हो गया है.ये धर्म के ख़िलाफ़ तो नहीं है लेकिन हमें अपनी परंपरा पर ध्यान देना चाहिए."

कारोबार

अगर आस्था और भक्ति से परे सिर्फ़ अर्थशास्त्र की बात करें तो जन्माष्टमी के मौके पर उत्तर और पूर्वोत्तर भारत में करोड़ों का कारोबार होता है.

चीन निर्मित कलाकृति
कई घरेलू कुटीर उद्योग मूर्ति कारोबार पर निर्भर हैं

मुरादाबाद, आगरा, सहारनपुर, हरिद्वार, जयपुर, भोपाल और कोलकाता के कई कुटीर और घरेलू उद्योग इन मूर्तियों के कारोबार निर्भर है.

लेकिन अब चीन से बन कर आईं मूर्तियाँ उनके सामने एक चुनौती के रूप में आ खड़ी हुई हैं.

पिछले महीने जब अमरीका ने कथित रूप से शीशे का पेंट चढ़ा होने के कारण चीन से आए 15 लाख खिलौनों को बाज़ार से हटा लिया तो एक रिपोर्ट के अनुसार अमरीका के घरेलू खिलौनों की मांग में 40 फ़ीसदी तक बढ़ोत्तरी हो गई.

क्या भारत को भी इससे सबक लेने की ज़रूरत है? जवाब में अर्थशास्त्री वी थपलियाल कहते हैं कि चीन ने पिछले कुछ सालों में अपने सस्ते सामान से पूरी दुनिया के बाज़ार को जिस तरह से पाट दिया है वो आज ईर्ष्या का विषय है लेकिन अपने घरेलू बाज़ार को संरक्षण देने के लिये निश्चय ही कुछ क़दम उठाए जाने की ज़रूरत है.

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