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दही हांडी का एक नया रूप... | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वैसे तो दही हांडी फोड़ने की परंपरा पुरानी है लेकिन इस साल मुंबई के विक्टोरिया जुबली स्कूल के नेत्रहीन बच्चों ने दही हांडी फोड़कर सबको अचंभित कर दिया. जिन आंखों ने कभी रोशनी ने देखी हो ऐसे बच्चों के लिए यह काम आसान नहीं था. लेकिन कहते है न कि ‘जहाँ चाह वहाँ राह.....’ इन नेत्रहीन बच्चों ने जन्माष्टमी के दिन दही हांडी फोड़ कर यह साबित कर दिया कि वे भी किसी से कम नहीं हैं. इन बच्चों के लिए एक-दूसरे का कंधा टटोलना आसान नहीं था लेकिन उससे भी मुश्किल था दही हांडी को तलाशना. ध्वनि के ज़रिए इन बच्चों को हांडी तक पहुँचाया गया और इन बच्चों की इस कामयाबी ने कई प्रत्यक्षदर्शियों की आंखों में आंसू तक ला दिए. धीरे–धीरे अपने आपको संभालते रतन पांडे के हाथ में जब हांडी की रस्सी पड़ी तो मानो वो उछल सा गया और उसे अपना काम कुछ बनता दिखाई दिया. दरअसल ये नेत्रहीन बच्चे हांडी का अंदाज़ मिलने के बाद संतुलन बनाकर निशाना साधते थे और हांडी टूटने के बाद गिरते पानी से सब सराबोर हो जाते थे. ग़ौरतलब है कि इस बार लगभग पांच हज़ार गोविन्दाओं की टोली मुंबई की सड़कों पर दही हांडी फोड़ने निकली थी. सिर्फ़ गोविन्दा ही नहीं गोपियाँ और डब्बावाले भी इस बार बड़ी संख्या में मटकी फोटते नज़र आए. गोपियों का मटकी फोड़ने का सिलसिला छह साल पहले मुंबई के कुर्ला शहर के गोरखनाथ क्रीडामंडल की कुछ लड़कियों ने शुरू किया था जो अब हर साल ज़ोर पकड़ता जा रहा है. | इससे जुड़ी ख़बरें दुनिया भर में मनी जन्माष्टमी मनोरंजन भारत में सुरक्षा के कड़े इंतजाम14 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस जन्माष्टमी के दौरान धमाका, पाँच मरे16 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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