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ख़तरे में है 'पहाड़ियों की रानी' का वजूद | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पश्चिम बंगाल का एकमात्र पर्वतीय पर्यटन केंद्र दार्जिलिंग अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहा है लेकिन पर्यटन के दबाव में हो रहे बेतरतीब विकास ने अब शहर की स्थिति बहुत ख़राब कर दी है. शहर अब एक ऐसी ख़तरनाक स्थिति में पहुँच गया है जहाँ भूकंप का हल्का झटका भी इसे मलबे में तब्दील कर सकता है. इस शहर की एक पहचान और भी है. वह है विश्व धरोहरों की सूची में शामिल ट्वाय ट्रेन यानी खिलौना गाड़ी. शहर के साथ ही ट्वाय ट्रेन का वजूद भी खतरे में है. अभी बीते सप्ताह ही जमीन खिसकने की घटना में इस ट्रेन के एक पुराने इंजन को नुकसान पहुँचा था. भूस्खलन
सिलीगुड़ी से 77 किमी दूर बसे इस शहर और आसपास के इलाके में हर साल बरसात के मौसम में भूस्खलन की घटनाओं से जान-माल का भारी नुकसान होता है. इस साल अब तक इन घटनाओं में चार लोग मारे जा चुके हैं और कई मकान नष्ट हो गए हैं. इसके अलावा ट्वाय ट्रेन की पटरियाँ उखड़ जाने की वजह से सिलीगुड़ी से कर्सियांग तक इस ट्रेन की आवाजाही भी ठप है. इस इलाक़े को पेड़ों की अवैध कटाई और तेज़ी से खड़े हो रहे कंक्रीट के जंगल का खमियाज़ा भुगतना पड़ा रहा है. इस साल हाल में आए भूकंप के झटकों ने शहर में 1934 के भयावह भूकंप की यादें ताजा कर दी हैं. उस भूकंप में सौ से ज्यादा लोग मारे गए थे. दार्जिलिंग में 1934 के भीषण भूकंप को देख चुके मेजर जनरल (रिटायर्ड) केपी मल्ला कहते हैं, "उस समय शहर की आबादी बहुत कम थी. अब यह बढ़कर एक लाख से ज़्यादा हो गई है. अंधाधुंध तरीके से हुए निर्माण के चलते सड़कें इतनी तंग हो गई हैं कि भूकंप की स्थिति में राहत और बचाव कार्य करना भी मुश्किल होगा." केपी मल्ला कहते हैं, "उस समय तो अधिकतर इमारतें एक या दो मंज़िल की थीं. लेकिन अब तो पांच-छह मंज़िली इमारतें आम हो गई हैं." बदलता शहर
अब शहर का चेहरा पूरी तरह बदल गया है. पहले जहां ब्रिटिश शासनकाल के दौरान लाल रंग के मकान इसकी पहचान थे, वहीं अब बहुमंज़िली इमारतें उग आई हैं. तीन साल पहले इलाक़े में बड़े पैमाने पर हुए भूस्खलन में 40 लोग मारे गए थे और कई इमारतें ढह गई थीं. उसके बाद राज्य सरकार ने सिलीगुड़ी के माकपा विधायक और नगर विकास मंत्री अशोक भट्टाचार्य को इस मामले की जांच का ज़िम्मा सौंपा था. उन्होंने भी अपनी रिपोर्ट में अवैध निर्माण को ही इस हादसे का ज़िम्मेदार ठहराया था. अशोक भट्टाचार्य कहते हैं, "पर्यटकों की बढ़ती तादाद के दबाव में तेज़ी से होने वाला शहरीकरण ही प्राकृतिक हादसे को बढ़ावा दे रहा है." भट्टाचार्य कहते हैं, "सरकार ने बहुत पहले ही पर्वतीय क्षेत्र को टाउन एंड कंट्री प्लानिंग एक्ट के दायरे में लाने का प्रयास किया था. लेकिन सुभाष घीसिंग की अगुवाई वाली दार्जिलिंग गोरखा पर्वतीय परिषद ने इसकी मंजूरी नहीं दी." घनी आबादी
दार्जिलिंग देश का सबसे ज़्यादा आबादी वाला पर्वतीय शहर है. मुंबई से 12 वर्षों बाद यहाँ आए प्रदीप नायक कहते हैं, "पूरे शहर का चेहरा ही बदल गया है. अब यह भी मुंबई की तरह कंक्रीट के जंगल में बदल गया है." चौक बाज़ार इलाके में होटल चलाने वाला राजेन थापा कहते हैं, "अब इस शहर को पहचानना मुश्किल है. ब्रिटिशकाल में बनी इमारतों की जगह आधुनिक भवनों ने ले ली है." राजेन कहते हैं, "शहर की आबादी और यहाँ पर्यटकों की आवाजाही जिस तेज़ी से बढ़ रही है उससे शहर के वजूद पर खतरा पैदा हो गया है." दरअसल गोरखालैंड आंदोलन ख़त्म होने के बाद नब्बे के दशक की शुरूआत में पर्यटन में उछाल आने पर शहर में अंधाधुंध तरीके से होटल और रिसार्ट खड़े होने लगे. लेकिन न तो सरकार ने इस पर कोई नकेल लगाई और न ही पर्वतीय परिषद ने. अब स्थानीय लोगों को इसी का खमियाजा भुगतना पड़ रहा है. दूसरी ओर, सरकार और परिषद अब इस पर अंकुश लगाने की दिशा में कोई ठोस पहल करने की बजाय एक-दूसरे को दोषी ठहराने में लगे हैं. प्रस्ताव भूस्खलन की घटनाएं बढ़ने के बाद सरकार ने तीन साल पहले कुछ प्रस्ताव तैयार किए थे. इनमें कमजोर इमारतों को गिराना, नेशनल हाइवे से अवैध कब्जा हटाना और मकानों की ऊंचाई 13 मीटर तक सीमित करना शामिल था. लेकिन इस पर अब तक अमल नहीं हो सका है. मंत्री अशोक भट्टाचार्य कहते हैं, "प्रशासन कमज़ोर इमारतों की एक सूची बना कर उनके मालिकों से उनको गिराने को कहेगा. वे सहमत नहीं हुए तो प्रशासन उन इमारतों को गिरा देगा. इन इमारतों के लिए इंसानी जीवन ख़तरे में नहीं डाला जा सकता." दार्जिलिंग नगरपालिका के पूर्व अध्यक्ष पासंग भूटिया कहते हैं, "नगरपालिका ने इमारतों की ऊंचाई 13 मीटर तक सीमित करने का एक प्रस्ताव पारित किया था. लेकिन इसे अब तक सरकारी मंजूरी नहीं मिल सकी है." बरसात के दौरान भूस्खलन से सड़क टूटने की वजह से इस इलाके का संपर्क बाहरी दुनिया से कटा रहता है. पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती आबादी और वाहनों की आवाजाही से होने वाले कंपन से मिट्टी ढीली हो जाती है और हल्की बारिश होते ही अपनी जगह छोड़ देती है. विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर सरकार, प्रशासन और परिषद ने समय रहते ध्यान दिया होता तो पहाड़ियों की रानी की यह दशा नहीं होती. लेकिन विडंबना तो यह है कि अब भी इसे बचाने की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हो रही है. |
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