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टॉय ट्रेन: विरासत को संवारने की कोशिश
लगभग 133 साल पहले ईस्टर्न बंगाल रेलवे के एक एजेंट फ्रैंकलिन प्रेस्टेड ने परिवहन खर्चों में कटौती के इरादे से दार्जिलिंग और सिलीगुड़ी के बीच टॉय ट्रेन यानी खिलौना गाड़ी का प्रस्ताव रखा था. उस समय प्रेस्टेड ने सोचा भी न होगा कि एक दिन ये टॉय ट्रेन विश्व की ऐतिहासिक धरोहर बन जाएगी. पिछले 121 वर्षों से यह ट्रेन दार्जिलिंग आने वाले सैलानियों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है. ऐतिहासिक धरोहर का दर्जा मिलने के बाद यूनेस्को के सहयोग से इसको नए सिरे से सजाने-संवारने का काम शुरू हो गया है. ऑस्ट्रिया की सिमरिंग माउंटेन रेलवे के बाद ये विश्व धरोहर का दर्जा पाने वाली दूसरी ट्रेन है. हालाँकि भूस्खलन, बार-बार पटरी से नीचे उतरने की घटनाओं और इंजन की समस्याओं ने इस ट्रेन की चमक थोड़ी फीकी कर दी है. लेकिन पूर्वोतर सीमांत रेलवे ने इन समस्याओं को दूर करने के लिए एक सलाहकार फर्म को नियुक्त करने का फ़ैसला किया है. इस ट्रेन को संवारने के लिए रेलवे ने 60 करोड़ रुपए खर्च करने की योजना तैयार की है.
पिछले दिनों दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे ने यूनेस्को के सहयोग से एक कार्यशाला का आयोजन किया. इसमें उन सभी लोगों ने भाग लिया जो किसी न किसी तरह इस ट्रेन से जुड़े रहे हैं. राष्ट्रीय रेल संग्रहालय के निदेशक राजेश अग्रवाल का कहना है कि दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे के विकास के साथ-साथ उसका संरक्षण भी ज़रूरी है. लंदन की दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे सोसाइटी की 31 सदस्यीय टीम ने टॉय ट्रेन में सफ़र भी किया. विवाद हाल में इस ट्रेन की गति बढ़ाने के लिए पारंपरिक स्टीम इंजन की जगह डीज़ल इंजन लगाने से विवाद पैदा हो गया था. यहाँ तक कि यूनेस्को ने भारतीय रेलवे बोर्ड से इस बारे में सफ़ाई माँगी थी. रेलवे का तर्क है कि ये डीज़ल इंजन अलग तरह के हैं. दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे, लंदन के कोषाध्यक्ष और टूर मैनेजर जार्डन ने इस ट्रेन को स्टीम इंजन से चलाने की अपील की है. उनका कहना था कि डीज़ल इंजन से उन विदेशी पर्यटकों को निराशा होगी जो इस ऐतिहासिक ट्रेन की सवारी करने यहाँ आते हैं. इस जुलाई में भूस्खलन के कारण इसकी पटरियों को भारी नुक़सान पहुँचा था और 73 दिनों तक ट्रेन की आवाजाही बंद रही थी.
अक्टूबर में भी ये ट्रेन पाँच दिनों तक बंद रही थी. 1998 में भी भूस्खलन के कारण ये ट्रेन तीन महीने तक बंद हो रही थी. इतिहास छोटी लाइन की ये ट्रेन अपने आप में एक इतिहास समेटे है. ईस्टर्न बंगाल रेलवे के एक एजेंट फ्रैंकलिन प्रेस्टेड के दिमाग में ये ख्याल आने के बाद उन्हें इसकी योजना तैयार करने में आठ साल लग गए. चार अप्रैल, 1881 को पहली बार ये ट्रेन सिलीगुड़ी से दार्जिलिंग पहुँची. अस्सी के दशक तक ये ट्रेन पर्वतीय इलाक़े में खाद्यान्न और अन्य सामानों की सप्लाई का प्रमुख जरिया थी. लेकिन इससे ज़्यादा समय लगने और सड़क मार्ग तैयार होने के बाद ये काम सड़क से होने लगा. ऐतिहासिक धरोहरों की सूची में शामिल होने के बाद इस ट्रेन में नए सिरे से जान फूंकने के जो प्रयास शुरू किए गए हैं, उससे लगता है कि इसकी धुँधली पड़ती चमक एक बार फिर लौट सकती है. |
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