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गुरुवार, 26 जुलाई, 2007 को 16:39 GMT तक के समाचार
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क्या महिला राष्ट्रपति होना बस प्रतीकात्मक ही है?

महिलाएँ
महिलाओं की आवाज़ आज भी कितनी सुनी जाती है?
देशभर में एक महिला के राष्ट्रपति बनने को महिला सशक्तीकरण से जोड़कर देखा जा रहा है, पर क्या ये भारतीय महिलाओं की स्थिती में वाकई कोई परिवर्तन लाएगा ?

आज यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि जहाँ एक ओर प्रतिभा पाटिल शपथ ग्रहण कर रहीं थीं, वहीं भारत सरकार देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी किरण बेदी के दावे को नज़रअंदाज कर उनसे कनिष्ठ अधिकारी को दिल्ली का पुलिस आयुक्त बनाने का फ़ैसला ले रही थी.

इस रवैये पर राष्ट्रीय महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष मोहिनी गिरी ने रोष जताते हुए कहा, पिछले दो वर्षों में यह तीसरा मामला है. किरण बेदी ही नहीं, हाल ही में विदेश सचिव की दौड़ में वीना सीकरी पिछड़ी और उससे पहले रेवा नैय्यर केबिनेट सचिव बनने से वंचित रहीं.”

समाज स्वीकार करता है?

यह सब देखते हुए दिल में ये सवाल उठता है कि क्या भारत में महिलाओं के लिए कुछ तय भूमिकाएँ ही हैं? क्या समाज निर्णय लेने वाली महिलाओं को आज भी स्वीकार नहीं कर पाता?

हालाँकि किरण बेदी ‘महिला कार्ड’ खेलना पसंद नहीं करतीं हैं. उनका मानना है कि महिला या पुरूष होना मापदंड नहीं होना चाहिए, पर वे यह भी मानती हैं कि समाज की असलियत कुछ अलग है.

 जहाँ अहम निर्णय लिए जाते हैं, वहाँ महिलाओं की उपस्थिति प्रतीकात्मक है. निर्णय लेते वक़्त उनका विचार नहीं लिया जाता. अगर कहीं हैं भी तो अकेली आवाज़ बनकर हैं.
किरण बेदी

किरण बेदी कहती हैं, “ जहाँ अहम निर्णय लिए जाते हैं, वहाँ महिलाओं की उपस्थिति प्रतीकात्मक है. निर्णय लेते वक़्त उनका विचार नहीं लिया जाता. अगर कहीं हैं भी तो अकेली आवाज़ बनकर हैं.”

वे ज़ोर देकर कहती हैं, “ आप कैबिनेट का ही उदाहरण लीजिए. कोई भी महिला आवाज़ बुलंद नहीं है. गृह, विदेश, उद्योग, रक्षा, वित्त, वाणिज्य, उद्योग किसी भी महत्वपूर्ण काम में महिलाओं की क्या भूमिका है ? ये आप देख सकते हैं.”

महिलाएँ ऊँचें पदों से शायद इसलिए भी वंचित रह जाती हैं क्योंकि किरण बेदी के शब्दों में ‘ वह पुरूषों की तरह दोस्त नहीं बना पातीं.’

भारतीय समाज की एक दूसरी हक़ीक़त ये भी है कि यहाँ कई कद्दावर महिला नेता हुईं हैं.

इंदिरा गाँधी जिन्हें एक समय गूँगी गुड़िया कहा गया, उन्हें बाद में इसी समाज ने 'दुर्गा' की उपाधि भी दी. आज चाहे यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गाँधी हों या उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती या फिर एआईएडीएमके प्रमुख जयललिता, इन्हें आप किसी से कम नहीं आँक सकते.

तुनकमिज़ाज महिलाएँ

लेकिन राजनीतिक पटल पर संघर्षरत महिला नेताओं को अक्सर तुनक मिज़ाज कहा जाता रहा है.

मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती कहती हैं, “ तुनक मिज़ाज की उपमा सबसे पहले इंदिरा गाँधी को दी गई. उनके बाद मायावती, जयललिता और मुझे भी इस विशेषण से नवाज़ा गया. इसका कारण यह है कि भारत ही नहीं सारी दुनिया के पुरूष कामकाजी महिला को देखने के आदी हैं.”

 महिला सशक्तीकरण की बात मुँह से तो सभी कहते हैं लेकिन महिलाओं को वाकई सशक्त करने से डरते हैं. पुरूषों में असुरक्षा की भावना है.हमारा समाज महिलाओं के साथ दूसरे दर्जे का व्यवहार करता है.”
मोहिनी गिरी

देश की आधी आबादी आज भी समाज में अपनी जगह तलाश कर रही है. पुरूषों के साथ ही नहीं बल्कि कुछ क्षेत्रों में तो दो कदम आगे भी बढा रही है. पर क्या समाज भी इस बदलाव को स्वीकार कर पा रहा है?

मोहिनी गिरी कहती हैं, “ भारतीय समाज इस बदलाव को स्वीकार करने के लिए अभी तक तैयार नहीं हो पाया है. महिला सशक्तीकरण की बात मुँह से तो सभी कहते हैं लेकिन महिलाओं को वाकई सशक्त करने से डरते हैं. पुरूषों में असुरक्षा की भावना है.हमारा समाज महिलाओं के साथ दूसरे दर्जे का व्यवहार करता है.”

लेकिन भारत ही क्यों दुनिया भर में महिलाएँ अपनी जगह के लिए लड़ रहीं हैं. अमरीका जैसे प्रगतिशील देश ने भी आज तक किसी महिला को राष्ट्रपति नहीं बनाया है.

ये भी एक अजब विडंबना है कि भारत में चाहे प्रतिभा पाटिल सेना की सर्वोच्च कमांडर बन गई हैं पर सेना में महिलाएँ आज भी 14 साल से ज़्यादा नौकरी नहीं कर सकतीं.

आशा की जानी चाहिए कि ये प्रतीकात्मक कार्रवाईयाँ ही आगे चलकर भारतीय महिलाओं के लिए रास्ता और आसान कर देंगी.

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