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गुरुवार, 14 अप्रैल, 2005 को 12:18 GMT तक के समाचार
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महिलाओं में निशानेबाज़ी की बढ़ती ललक

शूटिंग का अभ्यास करती महिलाएँ
शूटिंग का अभ्यास करती महिलाएँ
लखनऊ से केवल कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर बसे इस छोटे से गाँव माटनपुरवा गाँव में गजब की शांति है. एक तरफ गोमती बह रही है तो दूसरी ओर खड़ा है 250 साल पुराना लॉ-माटिनियर कॉलेज.

यही पर बंधे के नीचे पिपराघाट के एक मैदान में पिछले पांच सालों से आरके नारंग एक शूटिंग रेंज चला रहे हैं.

हर इतवार की सुबह दस बजते-बजते यह वीरान जगह चहक उठती है. देखते ही देखते सन्नाटे को चीरती गोलियों की आवाज से आसपास का इलाका गूंज उठता है. घास चरते जानवर दूर भाग जाते हैं और कुछ घंटे तक बराबर यों ही गोलियों की आवाजें आती रहती हैं.

दूरदराज से आए निशानेबाज आपस में बाते करते हैं तो केवल सटीक निशाने की, हथियारों और कारतूसों की.

इन शौकीनों की टोली में जहाँ पुलिस के आला अफसर हैं, वहीं बैंक के कर्मचारी, व्यापारी, गृहणियाँ और बच्चे भी हैं.

इस खेल में महिलाओं की इतनी बड़ी संख्या देखकर हैरत होती है. आपको ये जानकर और भी अचंभा होगा कि इनमें से अधिकतर महिलाएँ अल्पसंख्यक वर्ग से हैं.

अपने इस मिशन के बारे में नारंग बताते हैं कि ये रेंज उन्होंने अपने पिता स्वर्गीय केसरराम नारंग के नाम पर आरंभ की थी जो महिलाओं के अधिकारों के बड़े हिमायती थे.

नारंग कहते हैं,''यूँ तो हम यहाँ हर शख्स को मुफ्त में प्रशिक्षण देते हैं. महिलाओं से तो हम प्रवेश शुल्क भी नहीं लेते. ये प्रशिक्षित महिलाओँ को अपनी रक्षा स्वयं करने की प्रेरणा देता है.''

वो बताते हैं कि वर्ष 1947 से पहले ये रेंज ईस्ट इंडिया कंपनी की हुआ करती थी और यहाँ अंग्रेज केडेट प्रशिक्षण लेते थे. आज़ादी के बाद 50 तक यह जगह बेकार पड़ी रही.

फिर पाँच वर्ष पूर्व नारंग ने इसे लीज़ पर लिया और तब से यह रेंज चला रहे हैं.ये रेंज उत्तरप्रदेश राइफल अकादमी से जुड़ी है जो डॉ. करनी सिंह नेशनल अकादमी से संलग्न है.

महिलाएँ आगे

औरत को अबला नहीं सबला मानने वाली 72 वर्षीय रजिया ख़ान हर रविवार इस रेंज पर आती हैं. निस्संदेह वह महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है.

 महिलाओं से तो हम प्रवेश शुल्क भी नहीं लेते. ये प्रशिक्षण महिलाओँ को अपनी रक्षा स्वयं करने की प्रेरणा देता है
आरके नारंग, शूटिंग प्रशिक्षक

सन् 1954 से इस खेल से जुड़ी रजिया ढेर सारे मेडल जीत चुकी हैं. उनका मानना है,‘ये खेल हमारे आत्मनिर्भर होने का एक सार्थक उदाहरण है. कौन सा ऐसा क्षेत्र है जहाँ महिलाओं ने अपने जौहर नहीं दिखाए, फिर शूटिंग में भला वे क्यों पीछे रहे?’

बारह साल की अंकिता सिंह पहली बार नारंग की रेंज पर अपने पुलिस अफसर पिता के साथ आई हैं. उनकी बड़ी बहन आकांक्षा नेशनल निशानेबाजी में चौथा स्थान पा चुकी है.

वह कहती हैं ‘मै तो कुछ समय से ही सीख रही हूँ. यहाँ तो पहली बार आई हूँ. जब पापा अलीगढ़ में तैनात थे तो हमारे घर पर ही रेंज थी तो बस वहीं अभ्यास करती थीं.’

जहाँ महिलाओं के लिए ये अपने आप को सशक्त करने का माध्यम है वहीं पुरुषों के लिए एक शौक.

अक्षय स्वरूप 8वीं का छात्र है. वह .22 एयरराइफल चलाता है. अगर पूछिए क्यों तो कहता है ‘मुझे अच्छा लगता है बस.’

नारंग कहते हैं कि दुख की बात है कि इस रेंज पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज जसपाल राणा और राज्यबर्धन सिंह राठौर ने अभ्यास किया है वहाँ फंड की बहुत कमी है.

नारंग कहते हैं,‘अपना शौक और पिता के नाम के कारण ही मैं इसे चला रहा हूँ. इसमें और कोई फायदा नहीं है.’

निशानेबाज़ी एक ओलंपिक खेल है मगर इस खेल के प्रति अभी भी आम आदमी का रूझान नहीं है.

शायद इसलिए कि ये एक औसत आदमी के पहुँच के बाहर है. महंगे कारतूस खरीदना हर किसी के लिए संभव नहीं. इसलिए इन पांच वर्षों में नारंग चाहकर भी इस खेल को उतना नहीं बढ़ा पाए, जितना वो चाहते हैं.

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