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'लड़ाई के लिए महिलाओं को न भेजें' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत की सशस्त्र सेना के हर विभाग में जहां महिलाएं काम कर रही हैं वहीं एक रिपोर्ट में महिलाओं को युद्धक्षेत्र में न भेजने की सिफारिश की गई है. चीफ़ ऑफ स्टाफ कमिटी की अध्यक्षता में सेना में महिलाओं की भूमिका की समीक्षा की गई और रिपोर्ट दी गई जिसमें कहा गया है कि महिलाओं को ऐसे क्षेत्रों में युद्ध के लिए न भेजा जाए जहां आमने सामने लड़ाई की अधिक संभावना रहती है. रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि जहां दुश्मन के साथ लड़ाई में शारीरिक नुकसान की अधिक संभावना हो वहां महिलाओं को न भेजा जाए. राज्यसभा में प्रश्नकाल के दौरान एक लिखित प्रश्न के उत्तर में रक्षा मंत्री ए के एंटनी ने यह जानकारी दी है. उल्लेखनीय है कि सेना के अन्य सभी अंगों यानी मेडिकल, दंत चिकित्सा, इंजीनियरिंग आदि सेवाओं में महिलाओं की भागीदारी है. इतना ही नहीं शार्ट सर्विस में भी बड़ी संख्या में महिलाओं की नियुक्तियां हो रही है. लेकिन इसके बाद भी उन महिला सैनिकों को थोड़ा इंतज़ार करना पड़ेगा जो लड़ाई के मैदान में दुश्मन से दो दो हाथ करना चाहती हैं. दुनिया के कुछ देशों में महिलाओं को लड़ाई के मैदान में भेजा जाता है और भारत में एक वर्ग ऐसा है जो मानता है कि लड़ाई के मैदान में महिलाओं को भेजने में कोई परेशानी नहीं है. उल्लेखनीय है कि सेना में महिलाओं के साथ भेदभाव का मामला पिछले साल उस समय उठा था जब तत्कालीन उप सेनाध्यक्ष के पट्टाभिरमैय्या ने यह कहा था कि महिलाओं के बिना भी सेना का काम चल सकता है. हालांकि बाद में उन्होंने इस बयान के लिए माफी मांगी और कहा कि उनके बयान का ग़लत अर्थ निकाला गया. | इससे जुड़ी ख़बरें घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ क़ानून लागू26 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस इसी सत्र में पेश होगा महिला बिल23 नवंबर, 2006 | भारत और पड़ोस 'फ़ैसले लेने में महिलाओं की हिस्सेदारी नहीं'11 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस रिश्तों की समस्या से जूझता गोपालगंज27 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस फिर की गई महिलाओं की उपेक्षा19 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस आधी दुनिया...पर कितनी अधूरी06 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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