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शनिवार, 30 जून, 2007 को 13:42 GMT तक के समाचार
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लड़ाकू विमानों की ख़रीद को मंज़ूरी
एफ़-16
लॉकहीड मार्टिन का एफ़-16 भी होड़ में है
भारत सरकार ने वायुसेना के लिए 126 लड़ाकू विमान ख़रीदने की प्रक्रिया शुरू करने को अंतिम मंजूरी दे दी है. यह भारतीय सैन्य ख़रीद के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा एकमुश्त सौदा होगा और लगभग 30 हज़ार करोड़ रुपए ख़र्च होंगे.

रक्षा मंत्री एके एंटनी की अध्यक्षता में रक्षा खरीद समिति की बैठक में वायुसेना के लिए लड़ाकू विमानों को हासिल करने की प्रक्रिया शुरू करने की इजाज़त दी गई.

बैठक में रक्षा सचिव, रक्षा उत्पादन सचिव, वायुसेना प्रमुख और नौसेना प्रमुख के अलावा थलसेना के वाइस चीफ़ और डीआरडीओ के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए.

अब भारत को विमान बेचने के लिए बेकरार रूस, अमेरिका और यूरोप की कंपनियों से अगले महीने तक प्रस्ताव मंगाए जाएँगे और उसके बाद उनका विशेषज्ञ अध्ययन करेंगे.

संभावना है कि इस सौदे को पाने के लिए दुनिया की बड़ी कंपनियाँ ज़ोर लगाएँगी. अमरीका के एफ़-16 और एफ़-18, फ़्रांस का राफ़ेल, रूस का मिग 35, यूरोपीय संघ के यूरोफ़ाइटर टाइफ़ून और स्वीडन के ग्रिपिन विमानों के बीच होड़ है.

मगर इस फ़ैसले को लेने में भारत सरकार को छह साल लग गए, जबकि लंबे समय से यह चिंता जताई जा रही है कि भारतीय वायुसेना इस मामले में अपने पड़ोसियों चीन और पाकिस्तान से पिछड़ सकता है. इन विमानों को भारत पहुँचने में लगभग पाँच साल और लग सकते हैं.

क्यों हुआ विलंब?

सौदे को हरी झंडी दिखाने में इतना लंबा समय लगने की वजह के बारे में पूछे जाने पर रक्षा विशेषज्ञ कैप्टन भरत वर्मा ने बताया कि ख़रीद प्रक्रिया बार-बार बदलती रही, जिससे विलंब हुआ.

उन्होंने कहा कि इसके अलावा भारत में यह देखने को मिलता है कि इस तरह की ख़रीद के बाद जब कोई दूसरी सरकार आती है तो पूर्ववर्ती सरकार पर सौदे को लेकर उंगली उठाती रही है. अब वर्ष 2006 में रक्षा ख़रीद प्रक्रिया नीति बना दी गई है, जो काफ़ी स्पष्ट है. अब सारे सौदे इसी के अनुरूप होंगे.

 ख़रीद प्रक्रिया बार-बार बदलती रही, जिससे देरी हुई. इसके अलावा भारत में यह देखने को मिलता है कि इस तरह की ख़रीद के बाद जब कोई दूसरी सरकार आती है तो पूर्ववर्ती सरकार पर सौदे को लोकर उंगली उठाती रही है.
कैप्टन भरत वर्मा, रक्षा विशेषज्ञ

विमान हासिल करने में जो समय लगेगा इस संबंध में कैप्टन भरत वर्मा ने कहा कि दुनिया में जहाँ कहीं भी इस तरह के सौदे होते हैं तो तीन-चार साल लगते ही हैं. भारत विमान ख़रीदने से पहले विभिन्न परिस्थितियों में इन विमानों का परीक्षण करेगा और इस पर सरकार काफ़ी ख़र्च करती है.

उन्होंने कहा कि दुनिया के कई छोटे देश जो परीक्षण पर ख़र्च नहीं कर सकते, विमानों के बारे में भारत की रिपोर्ट को मानकर सौदा करते हैं.

पिछले साल जारी रक्षा ख़रीद प्रक्रिया की ऑफ़सेट नीति के तहत जिस कंपनी से सौदा होगा, वह शुरू में 18 विमान अपने स्टॉक से सप्लाई करेगी. बाक़ी 108 विमानों की असेंबली भारत में ही की जाएगी. इसके लिए सार्वजनिक क्षेत्र की हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स को चुना गया है.

इस तरह ये विमान भारत में बनाए जाएंगे और इनकी तकनीक का हस्तांतरण भी किया जाएगा. अनुमान है कि पहला विमान भारत को 2012 तक हासिल होगा.

रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता के अनुसार सौदा करते वक्त़ विमान की 40 साल की अवधि में होने वाला अनुमानित मरम्मत खर्च भी कंपनियों को बताना होगा. इसी के आधार पर सौदा होगा.

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