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'नक्सलियों के लिए नई पुनर्वास नीति' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
माओवादियों की आर्थिक नाकेबंदी से बुरी तरह प्रभावित झारखंड के मुख्यमंत्री मधु कोड़ा ने कहा है कि वे नक्सलियों के पुनर्वास की नई नीति बनाने जा रहे हैं. बीबीसी से हुई बातचीत में उन्होंने कहा कि नक्सली समस्या अकेले क़ानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है और इससे निपटने के लिए कई स्तर पर काम करना होगा. उधर माओवादियों की 48 घंटे की आर्थिक नाकेबंदी ख़त्म हो गई है और इससे बुरी तरह प्रभावित झारखंड में जनजीवन अफ़रातफ़री के माहौल में शुरु हो रहा है. पुनर्वास पैकेज मुख्यमंत्री कोड़ा ने माना कि सरकारी योजनाओं के ठीक तरह से लागू न होने और पंचायती राज जैसी संस्थाओं के ज़रिए जनभागीदारी के अवसर न मिलने के कारण नक्सली समस्या बढ़ी है. उन्होंने कहा कि यदि समय पर पंचायती राज चुनाव हो गए होते तो राज्य बनने के बाद नक्सली समस्या का विस्तार नहीं होता. उन्होंने कहा कि सरकार इस समस्या के निदान के लिए गंभीर है और चाहती है कि लोगों के बीच सरकारी योजनाओं की जानकारी पहुँचे और लोग जागरुक हों. नक्सलियों से बातचीत के सवाल पर उन्होंने कहा, "नक्सलियों के आत्मसमर्पण को लेकर एक नीति बनी हुई है लेकिन अब सरकार एक नई नीति बनाने जा रही है जिसमें आत्मसमर्पण करने पर अच्छा पैकेज दिया जाएगा." मधु कोड़ा का कहना है कि यह पैकेज ऐसा होगा कि हथियार डालने वाले नक्सली आत्मसम्मान के साथ जी सकेंगे. उन्होंने कहा कि कश्मीर और झारखंड की परिस्थितियाँ अलग हैं लेकिन सरकार देखेगी कि कश्मीर में चरमपंथियों को हथियार छोड़ने पर दिए जाने वाले पैकेज में से क्या-क्या यहाँ के पैकेज में शामिल किया जा सकता है. उन्होंने नक्सलियों पर आरोप लगाया कि अब नक्सलियों की चिंता विकास के कार्य और जनता नहीं रह गई है, वे तो खदान और उद्योगों से 'लेवी वसूलने' तक सीमित रह गए हैं. आर्थिक नाकेबंदी का सबसे अधिक असर झारखंड में होने का कारण पूछने पर उन्होंने कहा कि इस इलाक़े में सबसे अधिक रेल लाइनें हैं और सबसे अधिक खदानें हैं, लदान भी यहाँ ज्य़ादा है, इसलिए नक्सलियों को लगता है कि यहाँ सबसे अधिक प्रचार मिल सकता है और लेवी भी सबसे अधिक मिलता है. अफ़रा-तफ़री बुधवार की आधी रात के बाद माओवादियों की आर्थिक नाकेबंदी ख़त्म होने के बाद जिंदगी पटरी पर लौटती दिख रही है.
पिछले 48 घंटों से झारखंड एक तरह से ठप्प पड़ा हुआ था. न बसें चल रहीं थीं न ट्रक चल रहे थे. गुरुवार की सुबह एकाएक अफ़रा-तफ़री का माहौल दिख रहा था. दो दिनों से फँसे यात्री एकाएक अपने गंतव्य तक पहुँच जाना चाहते हैं तो यहाँ वहाँ खड़े ट्रक भी सड़कों पर आ गए हैं. ट्रकों में कोयला, बॉक्साइट और गिट्टी भरी हुई है. धनबाद के मंडल रेल प्रबंधक अजय शुक्ला के मुताबिक़ लातेहार लाइन के ठीक होने में अभी एक दिन का समय और लग सकता है. इसके अलावा बोकारो की ओर जिस लाइन पर हमला हुआ था उसे भी शुरु होने में अभी समय है. इसके अलावा गुरुवार से रेल यातायात भी सामान्य होने की संभावना है. उल्लेखनीय है कि दो दिनों से झारखंड में न रेलें चल रहीं थीं न सड़क यातायात. इस आर्थिक नाकेबंदी से सरकार को कोई दो अरब रुपयों से ज़्यादा के नुक़सान होने का अनुमान लगाया गया है. | इससे जुड़ी ख़बरें माओवादियों ने झारखंड को ठप्प किया27 जून, 2007 | भारत और पड़ोस माओवादियों के बंद का झारखंड में असर26 जून, 2007 | भारत और पड़ोस छत्तीसगढ़ में शीर्ष नक्सली नेता ग़िरफ़्तार06 मई, 2007 | भारत और पड़ोस सीतामढ़ी में माओवादियों का हमला01 अप्रैल, 2007 | भारत और पड़ोस माओवादियों के बंद से जनजीवन प्रभावित20 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस आत्मसमर्पण करने वाले नक्सली नकली07 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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