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बुधवार, 20 जून, 2007 को 09:58 GMT तक के समाचार
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असुरक्षा के साए में अफ़ग़ानिस्तान

अफ़ग़ानिस्तान
अब भी अफ़गान असुरक्षा के साए में जीने को मजबूर हैं
अफ़ग़ानिस्तान में सरकार और तालेबान और अल क़ायदा के बीच चल रही लड़ाई ने उस समय एक नया मोड़ ले लिया जब आत्मघाती बम धमाकों और कार बम हमलों की शुरुआत हुई.

पिछले डेढ़ वर्षों में लगभग 150 बम धमाकों ने ना सिर्फ़ सरकार को अपनी सैनिक रणनिति पर सोचने के लिए मजबूर किया है बल्कि आम लोगों की ज़िंदगी को बुरी तरह प्रभावित किया है.

रविवार यानी 17 जून को काबुल में पुलिस मुख्यालय के बाहर हुए बम हमले में 35 लोग मारे गए. हालांकि मरने वाले ज़्यादातर पुलिसकर्मी थे, वहां पास खड़े हुए कई आम लोग भी इस हमले की चपेट में आ गए.

पिछले चंद हफ़्तों में काबुल में हुआ यह पांचवा बम हमला था और पांच सालों में सबसे बडा हमला. अब लोग जानते हैं कि देश के दक्षिणी इलाकों में उठी हिंसा की लपटें काबुल तक पहुँचने लगी हैं. अब यहां हर आदमी सुबह दुकान खोलते हुए या दफ़्तर जाते हुए हर जगह संदेह से देखता है कि कहीं कोई गाड़ी अचानक आकर रुक तो नहीं गई है. या कोई गाड़ी ज़रूरत से ज़्यादा धीमी रफ़्तार से उसकी ओर तो नहीं बढ़ रही है.

 काम करने के लिए तो घर से निकलना ही पड़ता है, दूसरा चारा क्या है. मगर अब हालात ऐसे हैं कि दस मिनट घर पहुंचने में देर हो जाए तो परिवार वालों के दस फ़ोन आ जाते हैं.
अहमद शाह, काबुल निवासी

काबुलवासी अहमद शाह कहते हैं कि लोगों के घर में अब लौटने का इंतज़ार बेसब्री से होता है.

वो कहते हैं, "काम करने के लिए तो घर से निकलना ही पड़ता है, दूसरा चारा क्या है. मगर अब हालात ऐसे हैं कि दस मिनट घर पहुंचने में देर हो जाए तो परिवार वालों के दस फ़ोन आ जाते हैं. बुरा वक़्त चल रहा है."

तालेबान को सत्ता से हटाए जाने के बाद काबुल में हालात तेज़ी से सुधरे थे और पिछले पांच सालों में शहर जैसे खंडहर से दोबारा खड़ा हो रहा था मगर अब एक बहुत बड़ा ‘लेकिन’ लोगों के सामने है.

काबुल की पुलिस में क्या वाक़ई इतनी क्षमता है कि वो समय रहते स्थिति पर नियंत्रण पा ले.

काबुल के एक पुलिस कमिश्नर जनरल अली शाह पख़्तिवाल को वैसे तो पूरा भरोसा है. वो कहते हैं, "दुनिया में कहीं भी देख लीजिए आत्मघाती बम हमलों को रोकना तो हर किसी मुल्क में मुश्किल है लेकिन हमारी पूरी कोशिश होती है. कई दफ़ा हमारी ख़ुफ़िया एजेंसियों की जानकारी के आधार पर हमले से पहले ही हमने लोगों को ग़िरफ़्तार किया है और आज वो जेल में हैं."

अफ़ग़ानिस्तान की ज़्यादातर पुलिस स्थिति से कैसे निपटेगी यह भी एक सवाल है क्योंकि पुलिस को दो हफ़्ते से तीन महीने के प्रशिक्षण के बाद ही तैनात कर दिया जाता है.

पिछले डेड़ साल मे ज़्यादातर बम हमलों में निशाना अफ़ग़ान सुरक्षा बलों या देश में तैनात अंतरराष्ट्रीय सेनाओं को बनाया गया है लेकिन फटने वाले बम आस पास मौजूद आम लोगों की परवाह नहीं करते.

सैनिक
अब भी देश के कई प्रांतों में अंतरराष्ट्रीय सैनिक तैनात हैं

सत्रह जून की रात ही अंतरराष्ट्रीय सेनाओं के एक हवाई हमले में सात बच्चे मारे गए. अंतरराष्ट्रीय सेना ने अफ़सोस ज़ाहिर करते हुए कहा कि उनके पास पुख़्ता ख़बर थी कि जहां हमला हुआ वहां सिर्फ़ अल क़ायदा के चरमपंथी मौजूद थे. लेकिन ऐसे हमलों से सरकार विरोधी ताक़तें मज़बूत ही होंगी यह सब जानते हैं.

अफ़ग़ानिस्तान की एक सांसद एरन यून बिगड़ती स्थिति की दो वजहें बताती हैं.

एरन यून कहती हैं, "इसकी दो वजहें हैं. आंतरिक और बाहरी. पहली वजह ये है कि विभिन्न क़बीलों में और उत्तर और दक्षिणी क्षेत्रों में सत्ता संघर्ष है जो एक वजह है कि सरकार की ताक़त को कमज़ोर करता है. दूसरी वजह है विदेशी ताकतों का हस्तक्षेप. पाकिस्तान और ईरान तालेबान की सहायता कर रहे हैं. रूस और उज़बेकिस्तान जनरल दोस्तम जैसे उत्तरी नेताओं के हाथ मज़बूत कर रहे हैं.’

मगर इन सभी देशों ने अब तक ऐसे आरोपों का खंडन किया है.

सवाल अब यह है कि बढ़ते आतंक के माहौल में लोगों के पास चारा क्या है. युवा जो देश का भविष्य बनाते हैं, शांति क़ायम होने की उनकी आस टूट रही है. कुछ साल पहले काबुल में स्थिति सुधरती देख विदेशों से लौटे अफ़ग़ान युवा अब फिर बाहर की ओर देख रहे हैं.

भारत में पढ कर काबुल लौटी तराना वफ़ी कहती हैं, "आतंक के साथ समझौता कोई नहीं कर पाता. फिर वो शहर के ग़रीब लोग हों या वो जिनके पास इससे बाहर निकलने के विकल्प हैं. लेकिन हर बम विस्फोट लोगों को उनकी असहायता, मजबूरी और अमन के लिए लंबे इंतज़ार की याद ज़रूर दिलाता है. तरक्की के सपने पर सवालिया निशान ज़रूर लगाता है."

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